Monday, 30 May 2016

ह़ोरनी जो काल़ी भ़ेड गलाँदा!!

केवलुए जो मेजरे नें घुल़ाँदा, सुरेशेे पिच्छे कौशले लाँदा ,
अप्पु बणदा चिट्टा चल़ेरा, ह़ोरनी जो काल़ी भ़ेड गलाँदा |

जेह़ड़ा नेता बध़णा लग्गे, इस बिच नुक्साँ कढणां लग्गे ,
तिस्दयाँ बागियाँ तोपी तोपी, मूड़े अपणें बिच बठियांदा |

सारे डग्ग इन्नीं मुँह़ें लायो तां खरे खरे वर्कर खुड्डें लायो ,
दूँ दूँ लख्खाँ नें ह़ारयो जेहड़े, तिनां जो चेयरमैन बणांदा |

कम करदा डिक्टेटरे साह़ीं, कुसी दी नीं सुणदा सणांदा,
घ़ोड़यां ते तारी कईयाँ जो खोत्तयां पर भ़ी एह़ बठियांदा

कद्दी चंद्रेशा कद्दी विद्या पर, ह़ुण बालिये पर तीर चलाँदा
अप्पु ह़ै एह़ काल़ा भेड्डु ह़ोरनी जो काल़ी भ़ेड गलाँदा |

गध़यां पर बेह़्ई खुस ह़ोयो, दै़ नौल़ भी किच्छ कठरोयो ,
चौबिंहाँ साल्लां दे पुत्रे दे, सैह़ जबरयाँ ते पैराँ बँदौआंदा |

छडी देया इद्दे खेह़ड़े मितरो, बड़े खलड़ू इन्नीं पेड़े मितरो
ह़िमाचले देयो भ़लयो लोक्को, मैह़ता ऐह़ी गप्प गलाँदा

सुखराम जी इन्नीं फसवाये, सत मह़ाजन भी तां हरवाये,
साजशाँ रचदा सबनीं खलाफ कनें बड्डा कांग्रेसी कोह़ाँदा

बोलदा उह़ियां मैं नीं कद्दी ह़ारया, ह़र छोटा- बड्डा मारया
रामलाल जी दी याद दोआईये फिरी झट चुप ह़ोई जाँदा

बणदा बड्डा अजीत बिह़ारी, अपणीं लाड़ी दो बरी ह़ारी,
ह़ाखीं दस्सिये ता फट कम्बदा, जरकयाँ जो बड़ा डराँदा

  ....... . ........... .Manoj Mehta. .................

उसको....!!

उसकी बातों पर गुस्सा नही, अब रहम आता है ,
आजकल मुस्कुराहट पर भी, वो सहम जाता है |

मन तो उसका मचलता है, मुझसे बात करने को,
बीच में कमबख़्त लेकिन, उसका अहम आता है |

मेरी शोखी पर चिढ़ जाना उसका है समझ के परे,
दुश्मन मेरा सुना उसको, कुछ गरमागरम आता है |

सोचता हूँ मैं कि अब उसको मशविरा यह दे ही दूँ ,
जलन नही ज़िक्र में पर आदमी का करम आता है |

किरदार उसका जैसा भी हो मैं क्यों तफ़सरा करूँ,
जुल्म उसको ढाना तो मुझे निभाना धरम आता है |

पीठ पीछे तंज़ कसना, उसकी पुरानी फितरत है,
चलो इस ही बहानें हर जगह तो मेरा नाम आता है |
..... मनोज मैहता

उसको....!!

उसकी बातों पर गुस्सा नही, अब रहम आता है , आजकल मुस्कुराहट पर भी, वो सहम जाता है | मन तो उसका मचलता है, मुझसे बात करने को, बीच में कमबख़्त लेकिन, उसका अहम आता है | मेरी शोखी पर चिढ़ जाना उसका है समझ के परे, दुश्मन मेरा सुना उसको, कुछ गरमागरम आता है | सोचता हूँ मैं कि अब उसको मशविरा यह दे ही दूँ , जलन नही ज़िक्र में पर आदमी का करम आता है | किरदार उसका जैसा भी हो मैं क्यों तफ़सरा करूँ, जुल्म उसको ढाना तो मुझे निभाना धरम आता है | पीठ पीछे तंज़ कसना, उसकी पुरानी फितरत है, चलो इस ही बहानें हर जगह, मेरा नाम आता है |

Saturday, 28 May 2016

Time heals!!

All I want to speak what ever I know,
don't panic in the heat breeze shall blow.
Heart is sinking, anguish rising !
light of happiness but soon shall glow.
Time changes, accept it gayly,
if you head to old age kids too grow.
Fast moving train, this mental strain!
take it easy with time shall slow.
Water stopped, suppressed emotions,
find holes to out flow.
Might be furious every then and now,
wait patiently, shall melt like snow.

                                           ..Manoj Mehta

Thursday, 26 May 2016

म्ह़ारे टैम्में दियाँ खेल्लाँ..!!

गोल़ियाँ जाह़लु ते दिखिंयाँ, मत्तियां भ़ारी गेमां सिख्खियाँ ,
पाई नें गुत्ती ठिच्चों खेल्ली, गाँगिया दिंयां भ़ी मीरां दित्तियाँ |

हथ्थों, नक्का पूर भी झेल्ले, कलियाँ कनें जोट्टे भ़ी खेल्ले ,
बड्डे बड्डे भोट्टयाँ कन्नें, छोट्टियाँ छोट्टियाँ गोल़ियाँ ठिच्चियाँ |

कई बरी जाह़लु बैरिंगे भेह़्ड़ी, स्टीला दा भ़ोट्टा आया हत्थे ,
सिसताँ लाई लाई फिरी ताँ, मत्तियां भारी फाचड़ कित्तियाँ |

पँज्जी चोट जे खेलणी जाह़लु, बड़ा मजा औंद्दा था ताह़लु ,
चवान्नी- ठान्नीं कठरनें जो, झूठियां सच्चियाँ ध़ीड़ां दित्तियाँ |

गिट्टुआँ कठेरी खेलियाँ न्ह़ाराँ, ऐसा बाभ़ो वक्त था म्ह़ारा ,
सँज्झ़के टैम्में जागत्तां बिटियाँ छू छुह़ाते च खिट्टां दित्तियाँ |

चोर सपाह़ी, लुक ल्ह़काड़े तां चोट पिल दरगाड़े सरगाड़े ,
तिस मिट्ठे बक्ते बिच खबन्नीं ह़ोर क्या क्या गप्पां सिख्खियाँ |

समुंदर टापू खेलनें ताईंयें, सैंकलियाँ नें जल़े अँग्गण घ़रीटे ,
खान्नयाँ च उड़की उड़की, पतल़ियाँ फिरी जँग्घ़ां कित्तियाँ |

ह़ुणके बच्चे मोबाइले फकड़ी, खेलन गेम्स अकड़ी अकड़ी ,
कम्में जो ग्ला ता रोंणाँ बैंह़दे, कुरकरयाँ जो धीड़ाँ दित्तियाँ ||
.... मनोज मैहता

Wednesday, 25 May 2016

रुसवाई से डर लगता है

कैसे जाऊँ ब्याह-शादी में, शहनाई से डर लगता है ,
हालात ही हैं कुछ ऐसे कि परछाई से डर लगता है |

समझौता करवाऊँ क्योंकर, जाकर उनकी बस्ती में ,
सही बताऊँ मुझको ख़ुद ही, दंगाई से डर लगता है |

सभी वार हैं ख़ुद पर झेले, दुश्मनों से भिड़ा अकेले ,
अबके दौर में जानें पर क्यूँ, तन्हाई से डर लगता है |

ऐसा शक ओ शुबा है करती, इन दिनों मेरी बिंदिया ,
आलस के मारे भी आती, अँगड़ाई से डर लगता है |

इश्क़ किया है इतना उससे, उसको क्यों मालुम नही ,
सच में ही अब तो मुझको, रुसवाई से डर लगता है !!
...मनोज मैहता

कभी कभी गुप्तगु ज़रूरी है

इंसाँ में माना कि जीने की आरज़ू जरूरी है ,
मुहब्बत करने के लिये दर्द-ऐ-रूह ज़रूरी है |

हर जाम, मय और मयख़ाने पर मर मिटना ,
मद के मारों के दिलों की बेकाबू मजबूरी है |

साथ साथ रहते हुये भी साथ हम दोनों नहीं ,
दिनों- दिन बढ़ती जाती ख़्यालात की दूरी है |

माना कि हालात-ओ वक्त एक से रहते नहीं ,
पर यार इनको बदलने की जुस्तज़ू ज़रूरी है |

हर बार इश्क़-ओ मुहब्बत का ज़िक्र गलत है ,
कभी कभी तो मगर यह भी गुप्तगु जरूरी है |
..मनोज मैहता

बुरा मौसम बो!!

ऐह़ण पोआ दी औल़े बराह़ दे ,
इंद्र देओजी, एह़ क्या करा दे ?

कद्की गरमी, कद्की ठंडक ,
रंड्डां सांह़िंयाँ, नाटकां करा दे |

चल्ला झ़ख्खड़ ह़ाईबो जान्नीं ,
जणासां डड्डियां, बच्चे डरा दे |

अम्ब, मरूद, लीचियां दे दाणें,
समेत डाल़ुआं-पत्तरां झ़ड़ा दे |

दकानां आल़े म्ये बै़ठ्ठयो बेह़ले ,
तां फड़ियाँ वाल़े मौजाँ करा दे |

भ़ज्जयो रुख्खाँ तोड़ियाँ ताराँ ,
बिजलिया आलें थकैमें मरा दे |

लुग्गड़ ह़ोया ग्वाल़ू जे मछरया,
डँग्गर बचारे, फुलणुंयें चरा दे ||

He is....!!

Befriends enemies betrays friends ,
for money moves to extreme ends.
Bows down for getting the benefits,
does not love but smartly pretends .
Shows to be brave and courageous ,
in front of strong but quickly bends.
No one knows how and why he ever
gulps and drinks with empty hands .
Though light purse is a heavy curse
yet he seems blessed or just tends.
Has seen the end of such scoundrels
even then behavior he never amends .
I remain well far from alike and him,
treaty signal though he often sends.
..Manoj Mehta

Monday, 23 May 2016

O farmer O worker!!

This is your land-water
and is the sky too,
labourer wake up,
farmer and also you !
with your sweat and turmoil
these high houses got built ,
donated every drop of blood
that India could exist.
On the frontiers they kept awake ,
your sons put their lives on stake ,
with little brandy and dry breads
they shivered on icy stony beds.
Kept looting and enjoying the resources
these bloody political snakes,
these shameless creatures are hand in glove with burocrats. This holy land is your mother and fields are precious daughters , be cocious, awake and aggressive and save them from slaughters. Keep your fists and teeth tight , these are your weapons to fight ! wake up farmer wake up worker wake wake wake and wake! if you kept sleeping your lands they shall confiscate.!

Saturday, 21 May 2016

मेकी देणें लाड़िया...!!

चिट्टे कपडेयां लाई घ़ुम्मदा रैह़ंदा, सैह़ बत्ता साह़ड़िया ,
तरकाल़ां तौल़े मणसोआ करा, खाई जांह़ंगा प्ह़ाड़िया |

गप्प मेरी सच्च तुसाँ मनदे कैंह़नी, बो बेकूफ छोरूओ ,
डैण म्यो बोंकरिया पर बह़ई नैं, उड्डा दी थी लाह़ड़िया |

चार छौरू ह़ल्ली परसूं ह़ी, अंबे ह़ेठ खाई लेयो घ़ोगड़ें ,
चड़ेल जब्बरिया दिया चौथ, मरोड़ी गिय्यो कयाड़िया |

बाझ़ी मुँड्डे आल़ा कोखी मिल्लादा, इक्कुए दे मोड़े पर ,
कोह़की बोल्लें छह़्लेड्डा ह़ै ता कोह़की अद्धमसाणियां |

बनाह़ं बड़ा भारी रौल़ा पया, म्यो तिस जल़े माखुये दा ,
घु़ल़ी पोआ दा जणासां- बिट्टियां नें, दिनें ता दिहाड़िया |

म्ह़ारियां माऊँ म्ह़ाजो इन्नीं दायें, गप्पां सुणाई- डराई नें ,
सोआंदिंयां थिंय्यां बड़ोह, धलूँ , नगरोटे कनें चाह़डिया |

ह़ुण सारे टैम्में नें घरे झट बस, इसह़ी डरे पुजी पोआ दे ,
चड़ेल बचारी ता भौंएं बख्सी दिंग्गी, मेकी देणें लाड़िया |
--------------------------- मनोज मैहता ----------------------

Friday, 20 May 2016

Don't sleep when...!!

This is your land and is the sky too,
labourer wake up, farmer and also you!
With your turmoil these high houses got built,
gave up every drop of blood that India didn't tilt.
On the frontiers they kept awake,
your sons put their lives on stake.
With two pegs of brandy and dry breads
they shivered on icy stony beds.
Kept looting and enjoying the resources these bloody political snakes,
yes! these shameless creatures are hand in glove with bureauocrats.
This holy land is your mother and fields are precious daughters,
be cautious, enthusiastic and aggressive and save them from slaughters.
Keep your fists hard and tight,
these are your weapons to fight !
wake up farmer ! wake wake wake !
Don't ever sleep when freedom is on stake.

Dassa baliye kya Karna??

कैस दे गद्दी..!!

कुछ चीजां तां ह़ुंदिंयां जद्दी ,
बाझ़ी धणाँ बो कैस दे गद्दी |

नाँयें पिच्छे लगा दे कोह़ली ,
उह़ियां थल़ी नीं सेड़ी अद्धी |

रोज ह़ी मीटां मुर्गेयां धडा़ दे ,
पूज़्जा बाह़्मणां सद्दी सद्दी |

अनपढ़ां ताईं एह़ अखबारां,
पँजां रूपियां दी किलो रद्दी |

नँबर ओआ दे सौए ते जीरो ,
कजो हँड्डा दे पिठ्ठुआँ लद्दी?

कोरी ह़ी गप्प गलाँदा मैह़ता,
कद्धी तां रह़ अपणिंयां हद्दी ||

कैस दे गद्दी..??

कुछ चीजां तां ह़ुंदिंयां जद्दी,
बाझ़ी धणाँ बो कैस दे गद्दी |

नाँयें पिच्छे लगा दे कोह़ली,
उह़ियां थल़ी नीं सेड़ी अद्धी |

रोज ह़ी मीटां मुर्गेयां धडा़ दे,
पूज़्जा बाह़्मणां सद्दी सद्दी |

अनपढ़ां ताईं एह़ अखबारां,
पँजां रूपियां दी किलो रद्दी |

नँबर ओआ दे सौए ते जीरो,
कजो हँड्डा दे पिठ्ठुआँ लद्दी?

कोरी ह़ी गप्प गलाँदा मैह़ता,
कद्धी तां रह़ तू अपणीं हद्दी ||
---------मनोज मैहता--------

Thursday, 19 May 2016

पर्मीशन लैणी ह़ै...!!

इक गल्ल गलाणें दी सर, तुसाँ ते पर्मीशन लैणी ह़ै ,
दस्सा कम्म कराणे दी, कितणी कमीशन लैणी ह़ै ?

विधायकाँ दे तनखाह़ीं-भ़त्ते इंह़िंयां नी बद्धी जाणे ,
रूलिंग आल़्यां अपणें सौगी ओपोजीशन लैणी ह़ै |

भ्रष्टाचार, झ़ूठ, चोरबजारी, जिथु पढ़ाये जाँदे ह़ैन्न ,
तिस स्कूले बिच मित्तरो, मैं भी एडमीशन लैणी ह़ै |

जिसा स्पीडा मह़ारे छौह़रू नशेयां बख्खे न्ह़सा दे ,
लग्गदा पँजाबे ह़राई असाँ फ़र्स्ट पजीशन लैणी ह़ै |

कुथकी ते बड्डा ह़थ बज्जे, मेरी भ़ी जिंदड़ी सज्जे ,
गायी दी सौह़ कार फिरी मैं एयर कंडीशन लैणी ह़ै ||
----------------------- मनोज मैहता ----------------------

Wednesday, 18 May 2016

पेड़ हमारे बाप की तरह हैं...!!

कलँच्चण ह़ोन उवाजी ताईं भौंएं मल्ह़ठ्ठी संग्घ़े ताईं ,
गप्प सच्ची ह़ै मित्तरो, रूख्ख ह़ुन्दे म्ह़ारे बब्बे साह़ीं |

ल्हौ़ला़ चाह़े चारे जो, भौंएं लेया कठेराी मरब्बे ताईं,
खाणें दा करदे बंदोबस्त, बो पूरा स्याणें बब्बे साह़ीं |

कद्धकी कड़ियां छत्ती दिंयां, बरल कद्ध़ी स्ह़ारे जो ,
पूरा भार झल्लया इन्ह़ां, जद्दुं भ़ी खरेड़े थम्बे साह़ीं |

कुर्सी बणीं भ़ी बठियाँदे तां बणीं नें मंज्जा सोआँदे ,
बणें कलम लिखणें जो तां कद्दकी गत्ता डब्बे ताईं |

बणीं दात्तण दन्द चमकेरे, हड्ड तैं मोआ चब्बे तां ह़ी ,
कदर इन्ह़ां दी कर पूरी, रूख्ख ह़ैन्न म्या बब्बे साह़ीं |

चील- दयार तूत- द्रेकाँ, ह़ैन्न कुथकी एह़ अम्बे साह़ीं ,
मत जाड़ा इन्ह़ांजो म्यो, रुख्ख ह़ैन्न म्ह़ारे बब्बे साह़ीं ||
------------------------------------------- - मनोज मैहता

Tuesday, 17 May 2016

जोश रखता हूँ..!!

अपने ही दम पर दुनिया जीत लूँगा मैं ,
तूफानों से टकरानें का जोश रखता हूँ |

उनके उकसाने से, मुस्कान खिल उठी ,
वक्त पर काबू मैं, अपने होश रखता हूँ |

मत दिखाईये मुझे, चोट- मौत का भय ,
हूँ !और साथ भी, सरफरोश रखता हूँ |

हर चीज़ पर अपना हक जताने वालो !
क्या शक्ल से मैं ख़ानाबदोश लगता हूँ ?

चलिये आप ही बड़े और मैं छोटा सही,
चंद और दिन यूँ भी मदहोश रखता हूँ |

वज़ूदों की जँग का लोग करेंगे फैसला ,
सबके सामने अपने गुण-दोष रखता हूँ ||
------------------------------ - मनोज मैहता

जल़ी एह़ तौंदी..!!

खड़े कुआल़ां चढ़दी आई, रिढ़ियां ध़ारां गौह़ंदी आई ,
खड्डां- नाल़ुआं पत्थर तप्पे, बड़ी बुरी एह़ तौंदी आई |

पर्सीनें ने पिंडा तलमल, सड़काँ बिच रुक्की हलचल ,
पख्याँ ते भ़ी लू ह़ी चल्ले, बोड़ियाँ नड्डां सकौंदी आई |

ब़ल्लड़ु सुक्का,खल्ह़ड़ु सुक्का ऐसा गंदा ह़ै एह़ ध़ुप्पा,
धूड़ी भकोईयो फरड़ी कुत्ती, लग्गे म्यो हल़्कोंदी आई !

उआने बरैंडे बिच माक्खियाँ, भ़त्ते पर कढन झाँकिंयां,
मच्छरां दी इक पूरी पल़्टण, बुरे दौल्लें भण़कोंदी आई |

पिठ्ठी बिच निकल़ी पित्ती, नाखनाँ सारी छिल्ली दित्ती ,
रसोईया ते भाबो भी, दिख्खा किंह़िंयां खरकोंदी आई |

घ़ड़ोलुए दा ठंडा पाणी, कुथु मिलनां बो मेरिये जान्नीं,
फिल्टरां फ्रिज्जां दी ठरक म्यो ह़ुण तां पूरी होंदी आई |
---------------------------------------------- - मनोज मैहता

क्या फायदा...

रूठने का फायदा ही क्या, जब वो मनायेंगे नही ,
यत्न जितने चाहे कर लो, पास अब आयेंगे नही |

मिन्नतें भी देखीं करके, बड़ी ज़लालत की सहन ,
टेके बहुत घुटने हमने पर अब गिड़गिड़ायेंगे नही |

सुर्ख आँखें, खुश्क चेहरा, अजीब सब हालात हैं ,
लेकिन वो ग़मग़ीन तर्रानें, कभी गुनगुनायेंगे नही |

गूँजेंगे जब जब कानों में, वो कहकहे तेरे सुरमई ,
सुकून तो दिल को आयेगा मगर मुस्कुरायेंगे नही |

देख कर जिनको तुम, माँगते थे दुआयें प्यार की ,
आसमाँ में टूटते हुये तारे, अब नज़र आयेंगे नही ||
--------------------------------------- -मनोज मैहता

Monday, 16 May 2016

पहरा

उन्होनें मेरी सोच पर भी पहरा बिठा दिया,
ज़िगर पर ज़ख्म बड़ा ही गहरा बना दिया |

शक, डाह, आवेश के तूफानों नें मिलकर,
दोस्तो मुझको गूँगा और बहरा बना दिया |

झुलसा दिया नफरतों की गर्मी से कुछ यूँ ,
ख़िली सी हस्ती को मेरी सहरा बना दिया |

चुप्पी और तन्हाई को, मेहर कहते हैं सारे,
देखिए चुप्पी ने हाल कैसा मेरा बना दिया |

उलझनों, मुसीबतों से अब डर नहीं लगता,
मैने अपने दिल को उनका, डेरा बना दिया ||
-------------------------------- -- मनोज मैहता

जरूरी है...

यह जरूरी है कि अच्छी सोहबत होनी चाहिए,
इंसान को इंसान से मगर मुहब्बत होनी चाहिए |

उसके नवाबी घर में जाकर, जागी ये ख्वाहिशें,
कि गुज़ारे लायक मेरे पास दौलत होनी चाहिए |

जाकर बेगाने शहर में कोई तो पहचान ले तुम्हें,
इतनी तो आदमी की भी शौहरत होनी चाहिए |

माना कि मासूम है वो और दिलकश भी बड़ी,
कभी पर माशूक की भी मुरम्मत होनी चाहिए |

गोदी मे बिठाते ही वो दाढ़ी को लग गये नोचनें,
ऐसे दिल फरेब इंसाँ को तो लानत होनी चाहिए ||
--------------------------------------- -- मनोज मैहता

चैनों करार

चैनों करार मेरा यूँ ही लूट जाते हैं वो ,
छोटी छोटी बातों पर रूठ जाते हैं वो |

अकड़े रहते हैं तूफ़ानों में जो दरख़्त ,
इक ही झटके से फिर टूट जाते हैं वो |

अपने लफ्ज़ों को वापिस कैसे मैं लूँ ,
कमान से तीरों जैसे छूट जाते हैं जो |

मेरी जीभ को ही काट डालिये हुज़ूर ,
यकायक ही जिससे फूट जाते हैं वो |

अपने अरमानों की है चटनी बन गई ,
अदाओं ही से इतना कूट जाते हैं वो |
------------------------- -- मनोज मैहता

Sunday, 15 May 2016

Let's measure the depth of our roots

ह़वा च लटक्कदियाँ लम्मियां एह़ बड्डयां बड़ाँ दियां ,
असां भी नापणिंयां गह़राईयाँ अपणिंयां जड़ाँ दियां |

मन्नयां अरो कि मांह़्जो ते चैंट्ट हुँग्गा सैह़ लख गुणां ,
जाची रती नी सक्या स्पीडां पर म्हारियां फड़ाँ दियां |

जाह़लु दिख्खा तिन्ह़ां नें, पेई बस रैह़ंदी बरड़ पँच्ची ,
कंद्ध़ां भी मोइयां टौणिंयाँ ह़ोईयां ऊचयां घराँ दियां |

शैम्पुआं-क्रीमां लाई लाई जीह़ँडा तिन्नी छड्डया पुट्टी ,
मुँड ता टटरी ह़ोया ह़ी था, ह़ुण मुछाँ भी झड़ा दियां |

लग्गा दा अज फौजिएं, छुट्टिया घ़रे आई पुजणां है ,
  सस्स कनें नूह़ं चंगेरा बिच,  ह़ैन्न रोटियां घ़ड़ा दियां |

कवि कनें नेते करदे रैह़ंदे, घरां च बेह़ी करी देशप्रेम
तिन्हां दे बुह़्ड़े दा क्या जाँदा, ह़ैन्न फौजाँ लड़ा दियाँ ||
---------------------------------------------- मनोज मैहता

Saturday, 14 May 2016

रईसों के पास कुछ नहीं...!!

नोट, नकदी और आलीशान मकानों को छोड़कर ,
रईसों के पास कुछ नहीं, बेज़ा शानों को छोड़कर |

लंबी कारों, सुनहरी हारों, कारखानों को छोड़कर ,
कुछ नही पास उनके, झूठे अरमानों को छोड़कर |

बना लिये माल गरीबों के आशियानों को तोड़कर ,
वो पूजते हैं दौलत, पैगंबरों-भगवानों को छोड़कर |

अपने मुरीदों, यार-दोस्तों व कद्रदानों को छोड़कर ,
लो दुश्मन से जा मिले वो, चाहवानों को छोड़कर |

जब कुछ न मिला तौहीन और तानों को छोड़कर ,
मैं घर को वापिस आ गया, धनवानों को छोड़कर |

कुछ सूफ़ियाना सुनाईये, रगीं तर्रानों को छोड़कर ,
रब्ब से लगाईये दिल, ज़ाली दीवानों को छोड़कर ||
----     ----     ----     ----     ----    -- मनोज मैहता

Friday, 13 May 2016

अलविदा

यह जो मैंनें छोड़ा है, वेश था बस पल दो पल का
मानवता और भाईचारा, संदेश मेरा है अविरल सा

मैं तुममें रहूँगा बन के शब्द, न हो जाओ  यूँ स्तब्ध
चाहे पक्षियों के कलरव में या मैं बहूँ  कल कल सा

अंत में जोत समायेगी, शक्ति में शक्ति मिल जायेगी
इस अनंत मिलन को ही, दिन तय था महफिल का

Wednesday, 11 May 2016

मेरे प्यारे दुश्मन..!!

'हस्ती' पर वो मेरी, जितने सवालात उठाते हैं ,
उतनी ही ज्यादा मेरी अहमियत को बढ़ाते हैं |

कुछ करने का जज़्वा, मुझे ले जाता है आगे ,
और वो मेरी इस ललक पर भी रूठ जाते हैं |

एक चिंगारी मेरे इर्द ग़िर्द, ग़र देख लें सुलगी ,
फूँके मार मार कर फिर, उसे शोला बनाते हैं |

मुझे घेरने जैसी बेकार, यूँ हरकत न कीजिये ,
कभी गीदड़ मिलके शेर को क्या मार पाते हैं ?

अपने तरीके से मैंने अपना मुकद्दर बनाया है ,
क्यों बेवजह मुझसे आप इतनी खार खाते हैं ?

ग़र मुफ़लिस- मज़लूम अपने रँग मे आ जायें ,
अमीर हुक्मरान तो दो ही पल में हार जाते हैं ||
-----     -----     -----    -----    -- मनोज मैहता

हम तो नेस्तानाबूद करने का जज़्वा पाले बैठे हैं

रत्न मढ़ित कुर्सियों को, फ़रेब से संभाले बैठे हैं ,
कुछ बुत आज ख़ुदा होने का वहम पाले बैठे हैं |

आवाम की खामोशी को, हल्के में मत लीजिये ,
ये लोग अपने अंदर भंयकर तुफान पाले बैठे हैं |

अपने पैनें हथियारों पर इतना भी मत इतराईये ,
शिवाजी की मानिद, हम भी खँज़र डाले बैठे हैं |

आपकी तरह हम आड़ लेके, हैं वार नहीं करते ,
सरेआम फौलादी सीना, लीजिये निकाले बैठे हैं |

आईये और दिखलाईये, अपनी बाज़ूओं का दम,
हम तो नेस्तानाबूद करने का जज़्वा पाले बैठे हैं ||
----    ----    ----   ----     ----     - मनोज मैहता

कभी कभी ज़िंदगी में...!!

कभी कभी ज़िंदगी मे ऐसे वक्त आते हैं ,
कि अपनें भी पास ही से, गुज़र जाते हैं |

हमनें बहार को देखा है उस मुकाम तक ,
तभी तो दौरे- ख़िज़ां में भी, मुस्कुराते हैं |

जो गरज़ते तो हैं मगर कभी बरसते नहीं ,
नभ में ऐसे भी कभी बादल दनदनाते हैं |

दूजों की करके किरकिरी हँसते हैं बहुत ,
हमारी जरा सी बात पे और तमतमाते हैं |

आदी है जो परिंदे बंद पिंजरों में रहने के,
खुले में भी उड़ते नहीं बस फड़फड़ाते हैं |

इतनी ललचाई नज़र से न देखिये इनको ,
ये सामाँ बस शो रूमों में ही चमचमाते हैं ||
---     ---     ---     ---     - मनोज मैहता

ख़ता किसकी...!!

ख़ता किसकी सज़ा किसको, कैसा यह दस्तूर है ?
दोस्त मेरे यह बता मुझको कि मेरा क्या कसूर है ?

गुज़ारिशें- मिन्नतें करे भी कोई तो कैसे करे भला ?
जिसे हैं शिकायतें मुझसे, वोह तो बहुत ही दूर है |

यूँ तो ज़हन में अपनें भी, शिकवे- ग़िले हैं बहुत ,
जिसको लेकर हैं मगर, वोह तो बहुत मग़रूर है |

मयखाने में मत जाईये, जाईये हकीम ही के वहाँ ,
जिसको कहते हैं 'इश्क़', सब दिमाग का फ़ितूर है !

करीब आना फ़िर दूर जाना, यह कैसी अदा हुई ,
उस सितमगर सँगदिल से, यह पूछना ज़रूर है |

यही बात बस सोचकर, ख़ामोश मैं हो जाता हूँ ,
हालात के आगे शायद, वोह भी कुछ मज़बूर है |
---      ---      ---      ---      ---   - मनोज मैहता

Friday, 6 May 2016

He betrays friends!!!

दुश्मणां नें यारी  करदा, मितरां नें गरद्दारी करदा,
नोट्टाँ दा ह़ै ऐसा भुख्खा, चोराँ दी सरदारी करदा।

बगानें माल्ले पर पौंद्दा, अपणें नें नीं झ़ौणां दिंदा,
रंड कुसी दी पंड कुसी दी,बेह़्ली ठाणेंदारी करदा।

अपणें कम्म कढाणें जो, थोड़ी बुड़क बध़ाणे जो,
कद्दकी तेरी कद्दकी मेरी, ठसे नें तरफदारी करदा।

थौह़ तिद्दा क्या लाणां, बेह़ला ह़ी दमाक खपाणां,
परोखा ठोक्की नें गाल़ी, सामणें भ़ा चारी करदा |

सीमटे सरिये लैंद्दा बेची, मुर्गयाँ खाँदा पेची पेची,
खाली ह़ी रखदा बटुये, ठेकेदारी सरकारी करदा ||
-----     -----     -----     -----      --- मनोज मैहता

Thursday, 5 May 2016

Don't keep on testing my Love

बार बार तो यूँ इश्क का, न इम्तहान लीजिये ,
ग़र लेनी ही है आपनें, तो मेरी जान लीजिये |

आपके वास्ते सिर, हथेली पर लिये फिरते हैं ,
हलाल करनें के बस, साज़ो सामान लीजिये |

घुट घुटकर यूँ भी तो वर्बाद ही है यह हो रही ,
हाथ में मेरी ज़िंदगी की, खुद कमान लीजिये |

आपकी ही तलब है और आपकी तड़प इसे ,
नोंच आप इस दिल के सारे अरमान लीजिये |

वापिस राह-ऐ- इश्क़ पर लौट तो मैं आऊँगा ,
आप दफा होनें का वापिस फ़रमान लीजिये ||
---     ---     ---     ---     ---     --- मनोज मैहता

Monday, 2 May 2016

Your suspicion will drown you!!

बहुत ही बड़ा होने का वहम, ले डूबेगा जी आपको
सच बयान कर रहा हूँ अहम, ले डूबेगा जी आपको |

मेरा क्या जायेगा खो , मैं तो महज़ एक मज़दूर हूँ
ये अकड़ और बड़बोलापन, ले डूबेगा जी आपको |

पत्थरों का लेके तकिया, सोया हूँ मैं तो लाखों बार
राजसी पर यह रहन-सहन, ले डूबेगा जी आपको |

सड़कों पर आकर मिलते हैं, असली तिफ़लो जवाँ
चँद चमचों का ये दरबारीपन,ले डूबेगा जी आपको |

भा गया उन्हें ग़र अँदाज़े ब्याँ या मेरी ये ग़ुस्ताखियाँ
पर आपका ये कर्मो- ज़लन, ले डूबेगा जी आपको |
---      ---     ---     ---     ---     ---    मनोज मैहता

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...