गोल़ियाँ जाह़लु ते दिखिंयाँ, मत्तियां भ़ारी गेमां सिख्खियाँ ,
पाई नें गुत्ती ठिच्चों खेल्ली, गाँगिया दिंयां भ़ी मीरां दित्तियाँ |
हथ्थों, नक्का पूर भी झेल्ले, कलियाँ कनें जोट्टे भ़ी खेल्ले ,
बड्डे बड्डे भोट्टयाँ कन्नें, छोट्टियाँ छोट्टियाँ गोल़ियाँ ठिच्चियाँ |
कई बरी जाह़लु बैरिंगे भेह़्ड़ी, स्टीला दा भ़ोट्टा आया हत्थे ,
सिसताँ लाई लाई फिरी ताँ, मत्तियां भारी फाचड़ कित्तियाँ |
पँज्जी चोट जे खेलणी जाह़लु, बड़ा मजा औंद्दा था ताह़लु ,
चवान्नी- ठान्नीं कठरनें जो, झूठियां सच्चियाँ ध़ीड़ां दित्तियाँ |
गिट्टुआँ कठेरी खेलियाँ न्ह़ाराँ, ऐसा बाभ़ो वक्त था म्ह़ारा ,
सँज्झ़के टैम्में जागत्तां बिटियाँ छू छुह़ाते च खिट्टां दित्तियाँ |
चोर सपाह़ी, लुक ल्ह़काड़े तां चोट पिल दरगाड़े सरगाड़े ,
तिस मिट्ठे बक्ते बिच खबन्नीं ह़ोर क्या क्या गप्पां सिख्खियाँ |
समुंदर टापू खेलनें ताईंयें, सैंकलियाँ नें जल़े अँग्गण घ़रीटे ,
खान्नयाँ च उड़की उड़की, पतल़ियाँ फिरी जँग्घ़ां कित्तियाँ |
ह़ुणके बच्चे मोबाइले फकड़ी, खेलन गेम्स अकड़ी अकड़ी ,
कम्में जो ग्ला ता रोंणाँ बैंह़दे, कुरकरयाँ जो धीड़ाँ दित्तियाँ ||
.... मनोज मैहता
No comments:
Post a Comment