बहुत ही बड़ा होने का वहम, ले डूबेगा जी आपको
सच बयान कर रहा हूँ अहम, ले डूबेगा जी आपको |
मेरा क्या जायेगा खो , मैं तो महज़ एक मज़दूर हूँ
ये अकड़ और बड़बोलापन, ले डूबेगा जी आपको |
पत्थरों का लेके तकिया, सोया हूँ मैं तो लाखों बार
राजसी पर यह रहन-सहन, ले डूबेगा जी आपको |
सड़कों पर आकर मिलते हैं, असली तिफ़लो जवाँ
चँद चमचों का ये दरबारीपन,ले डूबेगा जी आपको |
भा गया उन्हें ग़र अँदाज़े ब्याँ या मेरी ये ग़ुस्ताखियाँ
पर आपका ये कर्मो- ज़लन, ले डूबेगा जी आपको |
--- --- --- --- --- --- मनोज मैहता
No comments:
Post a Comment