उसकी बातों पर गुस्सा नही, अब रहम आता है ,
आजकल मुस्कुराहट पर भी, वो सहम जाता है |
मन तो उसका मचलता है, मुझसे बात करने को,
बीच में कमबख़्त लेकिन, उसका अहम आता है |
मेरी शोखी पर चिढ़ जाना उसका है समझ के परे,
दुश्मन मेरा सुना उसको, कुछ गरमागरम आता है |
सोचता हूँ मैं कि अब उसको मशविरा यह दे ही दूँ ,
जलन नही ज़िक्र में पर आदमी का करम आता है |
किरदार उसका जैसा भी हो मैं क्यों तफ़सरा करूँ,
जुल्म उसको ढाना तो मुझे निभाना धरम आता है |
पीठ पीछे तंज़ कसना, उसकी पुरानी फितरत है,
चलो इस ही बहानें हर जगह तो मेरा नाम आता है |
..... मनोज मैहता
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