उन्होनें मेरी सोच पर भी पहरा बिठा दिया,
ज़िगर पर ज़ख्म बड़ा ही गहरा बना दिया |
शक, डाह, आवेश के तूफानों नें मिलकर,
दोस्तो मुझको गूँगा और बहरा बना दिया |
झुलसा दिया नफरतों की गर्मी से कुछ यूँ ,
ख़िली सी हस्ती को मेरी सहरा बना दिया |
चुप्पी और तन्हाई को, मेहर कहते हैं सारे,
देखिए चुप्पी ने हाल कैसा मेरा बना दिया |
उलझनों, मुसीबतों से अब डर नहीं लगता,
मैने अपने दिल को उनका, डेरा बना दिया ||
-------------------------------- -- मनोज मैहता
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