कैसे जाऊँ ब्याह-शादी में, शहनाई से डर लगता है ,
हालात ही हैं कुछ ऐसे कि परछाई से डर लगता है |
समझौता करवाऊँ क्योंकर, जाकर उनकी बस्ती में ,
सही बताऊँ मुझको ख़ुद ही, दंगाई से डर लगता है |
सभी वार हैं ख़ुद पर झेले, दुश्मनों से भिड़ा अकेले ,
अबके दौर में जानें पर क्यूँ, तन्हाई से डर लगता है |
ऐसा शक ओ शुबा है करती, इन दिनों मेरी बिंदिया ,
आलस के मारे भी आती, अँगड़ाई से डर लगता है |
इश्क़ किया है इतना उससे, उसको क्यों मालुम नही ,
सच में ही अब तो मुझको, रुसवाई से डर लगता है !!
...मनोज मैहता
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