Wednesday, 11 May 2016

मेरे प्यारे दुश्मन..!!

'हस्ती' पर वो मेरी, जितने सवालात उठाते हैं ,
उतनी ही ज्यादा मेरी अहमियत को बढ़ाते हैं |

कुछ करने का जज़्वा, मुझे ले जाता है आगे ,
और वो मेरी इस ललक पर भी रूठ जाते हैं |

एक चिंगारी मेरे इर्द ग़िर्द, ग़र देख लें सुलगी ,
फूँके मार मार कर फिर, उसे शोला बनाते हैं |

मुझे घेरने जैसी बेकार, यूँ हरकत न कीजिये ,
कभी गीदड़ मिलके शेर को क्या मार पाते हैं ?

अपने तरीके से मैंने अपना मुकद्दर बनाया है ,
क्यों बेवजह मुझसे आप इतनी खार खाते हैं ?

ग़र मुफ़लिस- मज़लूम अपने रँग मे आ जायें ,
अमीर हुक्मरान तो दो ही पल में हार जाते हैं ||
-----     -----     -----    -----    -- मनोज मैहता

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