'हस्ती' पर वो मेरी, जितने सवालात उठाते हैं ,
उतनी ही ज्यादा मेरी अहमियत को बढ़ाते हैं |
कुछ करने का जज़्वा, मुझे ले जाता है आगे ,
और वो मेरी इस ललक पर भी रूठ जाते हैं |
एक चिंगारी मेरे इर्द ग़िर्द, ग़र देख लें सुलगी ,
फूँके मार मार कर फिर, उसे शोला बनाते हैं |
मुझे घेरने जैसी बेकार, यूँ हरकत न कीजिये ,
कभी गीदड़ मिलके शेर को क्या मार पाते हैं ?
अपने तरीके से मैंने अपना मुकद्दर बनाया है ,
क्यों बेवजह मुझसे आप इतनी खार खाते हैं ?
ग़र मुफ़लिस- मज़लूम अपने रँग मे आ जायें ,
अमीर हुक्मरान तो दो ही पल में हार जाते हैं ||
----- ----- ----- ----- -- मनोज मैहता
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