ख़ता किसकी सज़ा किसको, कैसा यह दस्तूर है ?
दोस्त मेरे यह बता मुझको कि मेरा क्या कसूर है ?
गुज़ारिशें- मिन्नतें करे भी कोई तो कैसे करे भला ?
जिसे हैं शिकायतें मुझसे, वोह तो बहुत ही दूर है |
यूँ तो ज़हन में अपनें भी, शिकवे- ग़िले हैं बहुत ,
जिसको लेकर हैं मगर, वोह तो बहुत मग़रूर है |
मयखाने में मत जाईये, जाईये हकीम ही के वहाँ ,
जिसको कहते हैं 'इश्क़', सब दिमाग का फ़ितूर है !
करीब आना फ़िर दूर जाना, यह कैसी अदा हुई ,
उस सितमगर सँगदिल से, यह पूछना ज़रूर है |
यही बात बस सोचकर, ख़ामोश मैं हो जाता हूँ ,
हालात के आगे शायद, वोह भी कुछ मज़बूर है |
--- --- --- --- --- - मनोज मैहता
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