इंसाँ में माना कि जीने की आरज़ू जरूरी है ,
मुहब्बत करने के लिये दर्द-ऐ-रूह ज़रूरी है |
हर जाम, मय और मयख़ाने पर मर मिटना ,
मद के मारों के दिलों की बेकाबू मजबूरी है |
साथ साथ रहते हुये भी साथ हम दोनों नहीं ,
दिनों- दिन बढ़ती जाती ख़्यालात की दूरी है |
माना कि हालात-ओ वक्त एक से रहते नहीं ,
पर यार इनको बदलने की जुस्तज़ू ज़रूरी है |
हर बार इश्क़-ओ मुहब्बत का ज़िक्र गलत है ,
कभी कभी तो मगर यह भी गुप्तगु जरूरी है |
..मनोज मैहता
No comments:
Post a Comment