चैनों करार मेरा यूँ ही लूट जाते हैं वो ,
छोटी छोटी बातों पर रूठ जाते हैं वो |
अकड़े रहते हैं तूफ़ानों में जो दरख़्त ,
इक ही झटके से फिर टूट जाते हैं वो |
अपने लफ्ज़ों को वापिस कैसे मैं लूँ ,
कमान से तीरों जैसे छूट जाते हैं जो |
मेरी जीभ को ही काट डालिये हुज़ूर ,
यकायक ही जिससे फूट जाते हैं वो |
अपने अरमानों की है चटनी बन गई ,
अदाओं ही से इतना कूट जाते हैं वो |
------------------------- -- मनोज मैहता
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