यह जो मैंनें छोड़ा है, वेश था बस पल दो पल का
मानवता और भाईचारा, संदेश मेरा है अविरल सा
मैं तुममें रहूँगा बन के शब्द, न हो जाओ यूँ स्तब्ध
चाहे पक्षियों के कलरव में या मैं बहूँ कल कल सा
अंत में जोत समायेगी, शक्ति में शक्ति मिल जायेगी
इस अनंत मिलन को ही, दिन तय था महफिल का
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