नोट, नकदी और आलीशान मकानों को छोड़कर ,
रईसों के पास कुछ नहीं, बेज़ा शानों को छोड़कर |
लंबी कारों, सुनहरी हारों, कारखानों को छोड़कर ,
कुछ नही पास उनके, झूठे अरमानों को छोड़कर |
बना लिये माल गरीबों के आशियानों को तोड़कर ,
वो पूजते हैं दौलत, पैगंबरों-भगवानों को छोड़कर |
अपने मुरीदों, यार-दोस्तों व कद्रदानों को छोड़कर ,
लो दुश्मन से जा मिले वो, चाहवानों को छोड़कर |
जब कुछ न मिला तौहीन और तानों को छोड़कर ,
मैं घर को वापिस आ गया, धनवानों को छोड़कर |
कुछ सूफ़ियाना सुनाईये, रगीं तर्रानों को छोड़कर ,
रब्ब से लगाईये दिल, ज़ाली दीवानों को छोड़कर ||
---- ---- ---- ---- ---- -- मनोज मैहता
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