कभी कभी ज़िंदगी मे ऐसे वक्त आते हैं ,
कि अपनें भी पास ही से, गुज़र जाते हैं |
हमनें बहार को देखा है उस मुकाम तक ,
तभी तो दौरे- ख़िज़ां में भी, मुस्कुराते हैं |
जो गरज़ते तो हैं मगर कभी बरसते नहीं ,
नभ में ऐसे भी कभी बादल दनदनाते हैं |
दूजों की करके किरकिरी हँसते हैं बहुत ,
हमारी जरा सी बात पे और तमतमाते हैं |
आदी है जो परिंदे बंद पिंजरों में रहने के,
खुले में भी उड़ते नहीं बस फड़फड़ाते हैं |
इतनी ललचाई नज़र से न देखिये इनको ,
ये सामाँ बस शो रूमों में ही चमचमाते हैं ||
--- --- --- --- - मनोज मैहता
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