बाइज्ज़त क्यूँ बरी हो रहे मुज़रिम अदालतों से पूछिये
वतन पर मिटनें वालों की बेज़ा गई शहादतों से पूछिये
हिंदोस्ताँ उनके बाप-दादा की जागीर तो हरगिज़ नहीं
जो खेल रहे हैं हमसे रोज उनकी सियासतों से पूछिये
इस सर ज़मीं ने धूप-ओ-सायबाँ अनगिनत दौर देखे हैं
मुझ पर अग़र यकीं नहीं तो उजड़ी रियासतों से पूछिये
ये कायदे- कानून दुनिया के, हैं क्या गरीबों के लिये बनें
रईसों के आगे जो घुटने टेक देती उन ताक़तों से पूछिये
कुछ फ़ाकाकश हैं क्यों यहाँ फुटपाथों पे ही नँगे सो रहे
मदमस्ती में अधनंगों की महफिलों या दावतों से पूछिये
..मनोज मैहता