Wednesday, 29 March 2017

अदालतों से पूछिये..!!

बाइज्ज़त क्यूँ बरी हो रहे मुज़रिम अदालतों से पूछिये
वतन पर मिटनें वालों की बेज़ा गई शहादतों से पूछिये

हिंदोस्ताँ उनके बाप-दादा की जागीर तो हरगिज़ नहीं
जो खेल रहे हैं हमसे रोज उनकी सियासतों से पूछिये

इस सर ज़मीं ने धूप-ओ-सायबाँ अनगिनत दौर देखे हैं
मुझ पर अग़र यकीं नहीं तो उजड़ी रियासतों से पूछिये

ये कायदे- कानून दुनिया के, हैं क्या गरीबों के लिये बनें
रईसों के आगे जो घुटने टेक देती उन ताक़तों से पूछिये

कुछ फ़ाकाकश हैं क्यों यहाँ फुटपाथों पे ही नँगे सो रहे
मदमस्ती में अधनंगों की महफिलों या दावतों से पूछिये
                                                       ..मनोज मैहता

Thursday, 23 March 2017

लिखता चला गया... !!

लिखने का शौक था लिखता चला गया
बाज़ार-ए-ज़िन्दगी में बिकता चला गया

तराशा ना गया चूँकि था नींव का पत्थर
सारा महल मुझी पर, टिकता चला गया

एक अरसा बाद मैंनें  जब उतारी  ऐनकें
बहुत दूर तलक साफ दिखता चला गया

तोड़नें की मैंनें यूँ तो बहुतेरी की कोशिशें
मेरा तेरा रिश्ता लेकिन निभता चला गया

दौलत ज्यों ज्यों बढ़ी जेब-ओ-तिज़ोरी में
चैन-ओ- करार त्यूँ त्यूँ, छिनता चला गया

बुत था वो इक फ़कत ख़ुदा की शक्ल में
पागल मनोज उसी पर मिटता चला गया
                                  .. मनोज मैहता

Monday, 13 March 2017

ठिकाना कर.... !!

ग़मों में डूब जाने का न ऐ दिल कोई बहाना कर
तामीर हसरतों की ख़ातिर नया ही ठिकाना कर

बंदूक पास है माना तेरे  महज़ इस से नहीं होगा
जंग जीतनी है ग़र तूने  तब तय तो निशाना कर

कुदरती करिश्में से अब  है नहीं ये बदलने वाला
अपनें शेरों की मस्ती से  मौसम आशिक़ाना कर

यहाँ मुर्दानगी मरघट से भी  छाई हैं क्यों ज़्यादा
अपनीं दास्ताँ कहकर ये महफ़िल शायराना कर

तानाकशी रोज की तुम्हें ही  मार दे उससे पहले
ऊँची आवाज़ से तेरी वार तू भी क़ातिलाना कर

इरादे बुलंद हैं जो तेरे फिर किस बात का डर रे
मज़बूत हस्ती से अपनी कायल तो ज़माना कर

अम्र तेरी सालों से नहीं बल्कि दीदों से तय होगी
सदियों तक न जो भूले  ऐसा करतब स्याना कर

बहक रहें हैं रिंद 'मनोज' मयख़ाना दैर दिखता है
तोड़ेंगे जाम बुत समझके  बंद पीना पिलाना कर
                                            .. मनोज मैहता

Friday, 10 March 2017

मन खिली गया

दोपह़राँ ह़ुंदिया ह़ुंदिया तिकर दिल मेरा खिली गया
बड़ियाँ ना नुकरां बाद बेरोजगारी भ़त्ता मिली गया

Wednesday, 8 March 2017

मुँह पर मुस्कुराने की

पुरज़ोर कोशिश करता हूँ गले उसको लगाने की
अदा उसकी है भी क़ातिल मुँह पर मुस्कुराने की

चल अब छोड़ हसीं अग़्यार तुझ से ये नहीं होगा
ताक़त और पैदा कर तब हसरत कर मिटाने की

मैं तो हूँ ही पाक दिल जो हो सब कह ही देता हूँ
थोड़ी और कर वर्जिश जो मँशा है आज़माने की

जो करना है वो करता रह पर यह बात तो है तय
तेरी हरेक ओछी हरकत पर निगाहें हैं जमाने की

खुले हैं दर-ओ-दरवाजे  मज़े से भेदिये भिजवा दे
मेरे पास तो हर ख़बर है  तेरे खुफ़िया ठिकाने की

मैं गुलाम-ए-आवाम हूँ  पर हूँ आँखों का तारा भी
चल अब छोड़ दे आदत मुझसे जलने जलानें की
                                             .. मनोज मैहता

मुँह पर मुस्कुराने की

पुरज़ोर कोशिश करता हूँ गले उसको लगाने की अदा उसकी है भी क़ातिल मुँह पर मुस्कुराने की चल अब छोड़ हसीं अग़्यार तुझ से ये नहीं होगा ताक़त और पैदा कर तब हसरत कर मिटाने की मैं तो हूँ ही पाक दिल जो हो सब कह ही देता हूँ थोड़ी और कर वर्जिश जो मँशा है आज़माने की जो करना है वो करता रह पर यह बात तो है तय तेरी हरेक ओछी हरकत पर निगाहें हैं जमाने की खुले हैं दर-ओ-दरवाजे मज़े से भेदिये भिजवा दे मेरे पास तो हर ख़बर है तेरे खुफ़िया ठिकाने की मैं गुलाम-ए-आवाम हूँ पर हूँ आँखों का तारा भी चल अब छोड़ दे आदत मुझसे जलने जलानें की

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...