पुरज़ोर कोशिश करता हूँ गले उसको लगाने की
अदा उसकी है भी क़ातिल मुँह पर मुस्कुराने की
चल अब छोड़ हसीं अग़्यार तुझ से ये नहीं होगा
ताक़त और पैदा कर तब हसरत कर मिटाने की
मैं तो हूँ ही पाक दिल जो हो सब कह ही देता हूँ
थोड़ी और कर वर्जिश जो मँशा है आज़माने की
जो करना है वो करता रह पर यह बात तो है तय
तेरी हरेक ओछी हरकत पर निगाहें हैं जमाने की
खुले हैं दर-ओ-दरवाजे मज़े से भेदिये भिजवा दे
मेरे पास तो हर ख़बर है तेरे खुफ़िया ठिकाने की
मैं गुलाम-ए-आवाम हूँ पर हूँ आँखों का तारा भी
चल अब छोड़ दे आदत मुझसे जलने जलानें की
.. मनोज मैहता
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