लिखने का शौक था लिखता चला गया
बाज़ार-ए-ज़िन्दगी में बिकता चला गया
तराशा ना गया चूँकि था नींव का पत्थर
सारा महल मुझी पर, टिकता चला गया
एक अरसा बाद मैंनें जब उतारी ऐनकें
बहुत दूर तलक साफ दिखता चला गया
तोड़नें की मैंनें यूँ तो बहुतेरी की कोशिशें
मेरा तेरा रिश्ता लेकिन निभता चला गया
दौलत ज्यों ज्यों बढ़ी जेब-ओ-तिज़ोरी में
चैन-ओ- करार त्यूँ त्यूँ, छिनता चला गया
बुत था वो इक फ़कत ख़ुदा की शक्ल में
पागल मनोज उसी पर मिटता चला गया
.. मनोज मैहता
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