Wednesday, 31 August 2016

ख़बर नही है ....!!

आज क्यों तिरी बातों में, मिरा ज़िक्र नही है
हमें वर्बाद करने की क्या अब फ़िक्र नही है

दूजे के मकान पर जो रखता है गंदी निगाह
नामुराद तिरा अपना सच्ची क्या घर नही है

बहुत करता रहा तू वालिद के सिर पर ऐश
तिरा अपना अभी शुरू हुआ सफर नही है

जिसको तू समझ रहा है मंज़िल-ए-मक़्सूद
वह चौड़ी सड़क तिरी असली डगर नही है

आँखों में हैवानियत का परदा जो चढ़ गया
तुझको बड़ा छोटा कोई आता नज़र नही है

ये चार- पाँच गुर्गे जो रहते हैं तिरे आसपास
तेरी क्या होगी इन्हें अपनी ही ख़बर नही है
                                       ..मनोज मैहता

Monday, 29 August 2016

हम फ़ाकाकश नवाब हैं पर हर बात का जवाब हैं

आपको किसनें रोका है चलकर आगे बढ़ो
राजनैतिक युद्ध है जरा अँदाज़ से तो लड़ो
ब्राह्मण सिंह लगाते हैं किन परिस्थितियों में
दोस्त मोहयालों का कभी इतिहास तो पढ़ो
पूरी शिक्षा का जी आपको सौंपा जिम्मा है
प्राईमरी के बच्चों की  मानिंद तो मत लड़ो
तेरे बदनाम करने से मेरा नाम और निखरा
तरक्की दूसरे की देख कर इतना मत सड़ो
तुम लड़े या वो लड़ा किसी ने क्या लेना है
कोई सुबूत तो लाओ फिर आगे बात करो






जवाब अवश्य दीजिये... और आप जान ही गये होंगे इस अँदाज़ में कौन बात कर सकता है..

क्या कोई 'जनसेवक', जिसे हम जन प्रतिनिधि, विधायक, सांसद, संसदीय सचिव, मंत्री या सर्वोच्च मुख्यमंत्री आदि अलंकरणों से विभूषित करते हैं जनता से इस निम्नलिखित ढंग से बातचीत करने के लिये अधिकृत है :
लीजिये प्रस्तुत हैं कुछ अँश :

अपने दोस्त काे आभार सहित....!!

छाती पर टैटू नँगा तन और कान में बाली है
कहलाने को तो है नेता पर लगता मवाली है

नशा किये हुये लगता है या भेजा फिरा हुआ
सभी ही मर्यादायें इसने तो जी तोड़ डाली हैं

वैचारिक मतभेदों पर ये गँदी गालियां देता है
शराब व चरस पीकर करता रहता जुगाली है

क्या होगा सरस्वती माता गॉडेस्स मिनर्वा का
जिस पावन दर की जिम्मे इसके रखवाली है

बेमुरब्बत सा ख़्वाब है बिगड़ा हुआ नवाब है
पैराशूट द्वारा उतरकर कुर्सी इसने संभाली है

हम तो नीचे लोग हैं जो भी कहना है कह लो
पर दाद दीजिये हमनें, ढंग से लिखी गाली है
                                        .. मनोज मैहता

Tuesday, 23 August 2016

शक की गिरफ़्त में आ गई!!

इक ऐसी गहरी बेबसी मेरी शख्सियत में आ गई
मेरी कलम भी उनके शक की गिरफ्त में आ गई

बातें करते हैं बहकी और आँख तक मिलाते नहीं
वो ऊँचे उठ गये या कमी मेरी हैसियत में आ गई

दिल में उमड़े ख़्याल-ए-अब्र बेताव थे बरसने को
तेज़ आतिश-ए-नफ़स तेरी पर हरकत में आ गई

मायूस रहना यूँ तो मिरे किरदार का हिस्सा न था
यूँ रहनें की आदत मगर अब रियाज़त में आ गई

तेरा कहने का सलीका शायद उसे भाया 'मनोज'
इक मीठी सी शोखी उसकी शिकायत में आ गई
                                             .. मनोज मैहता

Saturday, 20 August 2016

सब कुछ ही बहा ले जायेंगे!!

कब तक आख़िर याद ए ग़म इस दिल से संभाले जायेंगे
दरिया मेरी इन आँखों के तो सब कुछ ही बहा ले जायेंगे

इन वियवान राहों में भटकने से, तू क्यों डरता फिरता है
क्या पास है तेरे ऐ फ़ाकाकश, रहजन जो चुरा ले जायेंगे

तुझसे अफ़सुर्दा पायमाल-ए-ग़म, लाखों हैं इस दुनिया में
अजब पागल ये उजालों से भी अँधेरों को खँगाले जायेंगे

उदासी है चेहरे पर गहरी पर आस ज़िगर में है यह ठहरी
यह धड़क धड़क के कहता है आखिर वो मना ले जायेंगे

समेट ले तू अपने गम के सामाँ होने वाला है यहाँ हंगामा
ख़बर है कि कल बस्ती से सभी आशिक निकाले जायेंगे

काग़ज पर कलमें घिसघिस कर क्यूँ रातें काली करता है
फूंके तेरे संग ही ऐ मनोज तिरी गज़लों के रिसाले जायेंगे
                                                       .. मनोज मैहता

Sunday, 14 August 2016

जश्न-ए-आज़ादी!!

गुलामों से भी बदतर जी रही यहाँ पौनी आबादी है
उनकी जिंदा लाशों पर मन रहा जश्न-ए-आज़ादी है

वोही सियासी गुर्गे फिर कल सुबह तिरँगे फहरायेंगे
बदनाम जिनकी वज़ह से, हुई गाँधीजी की खादी है

समाजवाद पर चल चल कर पूँजीवाद पर ठहर गये
मॉलों की ख़ातिर चोरों नें खेतों को आग लगा दी है

अमीरों का गोरखधँधा है तभी गरीब नँगे का नँगा है
लाचार किसान नें अपनी देह पेडों पर लटका दी है

बलिदानों से जिनके सूरज उग उठा था मध्यरात्रि में
इतिहास के पन्नों से उनकी, कहानी तक मिटा दी है

एै मज़लूमों और दहकानो, उठो और भृकुटियां तानों
चँद गद्दारों नें आबरू-ए-वतन सब मिट्टी में मिला दी है

ये परेडें, ये सलामियां, ये ध्वजारोहण सब दिखावा हैं
जो उनके लिये आजादी है  वही अपनी तो वर्बादी है
                                                .....मनोज मैहता

Saturday, 6 August 2016

सलाम....!!

दुराचारी तस्करों के अड्डों की दहलीजें मज़बूती से लांघी हैं
जिला काँगड़ा के पुलसियों नें अब बैल्टें मुस्तैदी से बाँधी हैं

अफ़ीम, चरस, कोकीन, कैप्सूल, अब लगता है रुक जायेंगे
इक छरहरे की मेहनत से सभी दिलों में उम्मीदों की चाँदी है

लद गये दिन अब तस्करों के या उनके माताहत मसखरों के
रातों को भी दरोगाओं नें सड़को पे नाकों की पाईपें टाँगी हैं

थाने वालों की थुलथुल तौंदें गुज़रे दिनों की बात है अब यारो
उनके चेहरों पर ख़ुद नज़र आती कोई मरुस्थली सी आँधी है

सलाम उस जज़्वा-ए-नेकनीयत को जिसने सब बदल डाला
सलाम उन वालिदान को जिनसे जन्मा यह शेर दिल गाँधी है!

Friday, 5 August 2016

कर हलाल दो..!!

वक़्त की छाती पर तुम कर धमाल दो
कुंठाओं को आग की भट्ठी में डाल दो

फ़ितरत को औरों की जकड़ना है तुझे
राह में बिछा इरादों का बुलंद जाल दो

है यूँ तो जीवन भी शतरंज की बिसात
मगर निधड़क चल पहली तो चाल दो

पहेलियाें सी मुश्किलें इम्तिहान हैं तेरा
उठो कि कर हल आज सब सवाल दो

इश्क या जंग में जो हरकुछ है जायज़
नयनों में पाज़ी के ठोंक मिर्चें लाल दो

फाड़ फैंको चोला मज़हबी चिथड़ों का
नही हो रहा झटका तब कर हलाल दो ||
                               ... मनोज मैहता

Tuesday, 2 August 2016

सलाम के सिवा

नामचीनों के पास कुछ नहीं नाम के सिवा ,
रिंदों को काम क्या ज़िक्र-ए-जाम के सिवा |

तेरे लिये ही हैं बनें ये दिन के मस्त उजाले ,
हमारे पास कुछ नहीं स्याह शाम के सिवा |

ज़हाँ के रंगीं जलबे हैं बस तेरी लर्जिश से ,
अपने मन में कुछ नहीं कोहराम के सिवा |

समेट कर तुम अपनें हिस्से के रंग-ओ-नूर ,
सब में बांट दो फ़कत इस गुलाम के सिवा |

ज़रूरत अगर पड़ी तो उसकी करेंगे मदद ,
करेंगे बैरी से हरकुछ बस सलाम के सिवा |

                                    ..मनोज मैहता

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...