दुराचारी तस्करों के अड्डों की दहलीजें मज़बूती से लांघी हैं
जिला काँगड़ा के पुलसियों नें अब बैल्टें मुस्तैदी से बाँधी हैं
अफ़ीम, चरस, कोकीन, कैप्सूल, अब लगता है रुक जायेंगे
इक छरहरे की मेहनत से सभी दिलों में उम्मीदों की चाँदी है
लद गये दिन अब तस्करों के या उनके माताहत मसखरों के
रातों को भी दरोगाओं नें सड़को पे नाकों की पाईपें टाँगी हैं
थाने वालों की थुलथुल तौंदें गुज़रे दिनों की बात है अब यारो
उनके चेहरों पर ख़ुद नज़र आती कोई मरुस्थली सी आँधी है
सलाम उस जज़्वा-ए-नेकनीयत को जिसने सब बदल डाला
सलाम उन वालिदान को जिनसे जन्मा यह शेर दिल गाँधी है!
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