गुलामों से भी बदतर जी रही यहाँ पौनी आबादी है
उनकी जिंदा लाशों पर मन रहा जश्न-ए-आज़ादी है
वोही सियासी गुर्गे फिर कल सुबह तिरँगे फहरायेंगे
बदनाम जिनकी वज़ह से, हुई गाँधीजी की खादी है
समाजवाद पर चल चल कर पूँजीवाद पर ठहर गये
मॉलों की ख़ातिर चोरों नें खेतों को आग लगा दी है
अमीरों का गोरखधँधा है तभी गरीब नँगे का नँगा है
लाचार किसान नें अपनी देह पेडों पर लटका दी है
बलिदानों से जिनके सूरज उग उठा था मध्यरात्रि में
इतिहास के पन्नों से उनकी, कहानी तक मिटा दी है
एै मज़लूमों और दहकानो, उठो और भृकुटियां तानों
चँद गद्दारों नें आबरू-ए-वतन सब मिट्टी में मिला दी है
ये परेडें, ये सलामियां, ये ध्वजारोहण सब दिखावा हैं
जो उनके लिये आजादी है वही अपनी तो वर्बादी है
.....मनोज मैहता
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