Wednesday, 31 August 2016

ख़बर नही है ....!!

आज क्यों तिरी बातों में, मिरा ज़िक्र नही है
हमें वर्बाद करने की क्या अब फ़िक्र नही है

दूजे के मकान पर जो रखता है गंदी निगाह
नामुराद तिरा अपना सच्ची क्या घर नही है

बहुत करता रहा तू वालिद के सिर पर ऐश
तिरा अपना अभी शुरू हुआ सफर नही है

जिसको तू समझ रहा है मंज़िल-ए-मक़्सूद
वह चौड़ी सड़क तिरी असली डगर नही है

आँखों में हैवानियत का परदा जो चढ़ गया
तुझको बड़ा छोटा कोई आता नज़र नही है

ये चार- पाँच गुर्गे जो रहते हैं तिरे आसपास
तेरी क्या होगी इन्हें अपनी ही ख़बर नही है
                                       ..मनोज मैहता

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