नामचीनों के पास कुछ नहीं नाम के सिवा ,
रिंदों को काम क्या ज़िक्र-ए-जाम के सिवा |
तेरे लिये ही हैं बनें ये दिन के मस्त उजाले ,
हमारे पास कुछ नहीं स्याह शाम के सिवा |
ज़हाँ के रंगीं जलबे हैं बस तेरी लर्जिश से ,
अपने मन में कुछ नहीं कोहराम के सिवा |
समेट कर तुम अपनें हिस्से के रंग-ओ-नूर ,
सब में बांट दो फ़कत इस गुलाम के सिवा |
ज़रूरत अगर पड़ी तो उसकी करेंगे मदद ,
करेंगे बैरी से हरकुछ बस सलाम के सिवा |
..मनोज मैहता
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