Tuesday, 2 August 2016

सलाम के सिवा

नामचीनों के पास कुछ नहीं नाम के सिवा ,
रिंदों को काम क्या ज़िक्र-ए-जाम के सिवा |

तेरे लिये ही हैं बनें ये दिन के मस्त उजाले ,
हमारे पास कुछ नहीं स्याह शाम के सिवा |

ज़हाँ के रंगीं जलबे हैं बस तेरी लर्जिश से ,
अपने मन में कुछ नहीं कोहराम के सिवा |

समेट कर तुम अपनें हिस्से के रंग-ओ-नूर ,
सब में बांट दो फ़कत इस गुलाम के सिवा |

ज़रूरत अगर पड़ी तो उसकी करेंगे मदद ,
करेंगे बैरी से हरकुछ बस सलाम के सिवा |

                                    ..मनोज मैहता

No comments:

Post a Comment

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...