मेरे दिल के अरमानों पर ऐसा तीर चलाया है
तूनें तेरे कर्म-ओ-सित्तम से मेरा दर्द बढ़ाया है
न जानें किन गुनाहों के मुझसे लिये हैं बदले
मैनें तो हरेक खुशी को, तेरे लिये ठुकराया है
यूँ इस दर-ओ-बज़्म में लाखों हैं इंतज़ारज़दा
मैंनें मेरी हसरतों को पर, पूरी तरह दबाया है
ज़िद है अब मैं दिल को, हर सूरत न मारूँगा
मुझसे जो आँखमिचौली करता मेरा साया है
वक्त-ए-हवस में वफ़ा का ज़िक्र ही बेमानी है
आज मेरे हालातों ने ये ही मुझे सिखलाया है
. ... मनोज मैहता
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