Tuesday, 12 July 2016

ख़ुदगर्ज सियासतदानों से...!!

अत्फ़ाल उन्हीं के निखरकर आये हैं उनके कारखानों से
उम्मीदें बिलकुल न रखिये इन ख़ुदगर्ज सियासतदानों से

भीड़ वहाँ इतनी थी लगी कि गुमान होता था मज़में का
पकवान फ़ीके ही खाकर लौटे यारो हम ऊँची दुकानों से

यह पैराहन-ए-रईसाना है अँदाज़- ए- नवाबी कातिलाना
हैवानियत की तीख़ी बू है उठती पर उनके रोशनदानों से

चाहे सरगर्म रहाे या सुस्ताये से पर बचना उनके साये से
अव्वल दर्जे के हैं वो दगाबाज़ दूरी रखना इन शैतानों से

हरेक अरज़ी पर साँपों की मानिंद लगा लेते है कुँडलियाँ
ओ अल्लाह बचाले हमको तू इन अश्किया हुक़्मरानों से

अब क्या लिखे या क्या बोले बेहतर है कि बस चुप होले
लहू टपककर जम गया, मनोज के शिकस्ता अरमानों से

                                                       -- मनोज मैहता

अत्फ़ाल.. बच्चे   पैराहन.. पोशाक  अश्किया.. क्रूर

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