तेरे हुस्न-ओ-इश्क में बर्बाद हुये फिरते हैं ,
ज़ख्मीं हैं फिर भी पर शाद हुये फिरते हैं |
जिनको कभी हमीं नें दी थी पनाह यारो ,
हमसे कहीं बेहतर आबाद हुये फिरते हैं |
उम्मीद किससे रखें, हम अब रहमतों की ,
ख़ास अपने ही तो ज़ल्लाद हुये फिरते हैं |
हम चाह कर भी यारो, बन न पाये वायज़ ,
मगर उनको देखिये सय्याद हुये फिरते हैं |
हमारी ख़्वाहिशों को यूँ कर रौंद डाला है ,
तब ही ज़लील-ओ-नामुराद हुये फिरते हैं |
रस-ए-ज़िंदगी दौड़ता है नसों में आपकी ,
हम सड़ते बदन में, मवाद हुये फिरते हैं |
तुम्हें लोग कहते हैं मस्त ब्यार का झौंका ,
हम ज़हन का बस, अवसाद हुये फिरते हैं |
अभ्र सा तेरा बदन किसी हूर से कम नहीं ,
हम तो मुरदार ग़र्द-ओ-दाद हुये फिरते हैं |
--------------- -- मनोज मैहता -- -------------
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