किसी में वो बात नहीं तेरी बात की तरह ,
हस्ती कहाँ से पाली तिलिस्मात की तरह |
दोनों में ही मुकद्दर वाली लीक है ग़ायब ,
तेरा हाथ भी हूबहू है, मेरे हाथ की तरह |
चेहरे पर शैवाल और काई सी जम गई ,
आँखें बरसी बेमौसमी बरसात की तरह |
लोग ठहाके लगाते चले हैं इस के साथ ,
जनाज़ा मिरा लगता है बारात की तरह |
जितना सुलझाया उतना ही उलझ गया ,
इश्क़ बना काश्मीर के हालात की तरह |
लहज़े में तिरे फलस्फ़े की बू है आ रही ,
'मनोज' तू बन रहा है सुकुरात की तरह ||
...मनोज मैहता..