Monday, 29 May 2017

बारात की तरह... !!

किसी में वो बात नहीं तेरी बात की तरह ,
हस्ती कहाँ से पाली तिलिस्मात की तरह |

दोनों में ही मुकद्दर वाली लीक है ग़ायब ,
तेरा हाथ भी हूबहू है, मेरे हाथ की तरह |

चेहरे पर शैवाल और काई सी जम गई ,
आँखें बरसी बेमौसमी बरसात की तरह |

लोग ठहाके लगाते चले हैं इस के साथ ,
जनाज़ा मिरा लगता है बारात की तरह |

जितना सुलझाया उतना ही उलझ गया ,
इश्क़ बना काश्मीर के हालात की तरह |

लहज़े में तिरे फलस्फ़े की बू है आ रही ,
'मनोज' तू बन रहा है सुकुरात की तरह ||
...मनोज मैहता..

Monday, 15 May 2017

बुज्झा भ़ला जरा तिद्दा नाम ..!!

खुआ तिसा जो सुँड- बदाम
मीनकिया जो ह़ोया जखाम

साह़की बुड़कां मारी जा दा
इक नसेड़ी भ़ंगड़ पह़्लवाण

पट्ट तां पिल्लियाँ इक बरौबर
समझें अप्पु जो बड्डा  साह़न

मण-मण पक्कियाँ ठूसाँ मारे
नल़ुआँ बिच ह़ै  रति नी जान

सब ह़ी तां  समझी गयै ह़ोणे
बुज्झ़ा भ़ला जरा तिद्दा नाम...

Thursday, 11 May 2017

अलविदा !!

अब जबकि वो जज़्वा ही नही तो क्यों आरजू-ए-वसल करें
भूल कर हुस्न-ओ-शवाब, नज़र तुमको आखिरी ग़ज़ल करें

भिगो कर इस नामुराद- मनहूस चेहरे को सैल-ए-सरिश्क में
हल्का हो जाए गुबार-ए-जिगर पुरशिश कोशिश असल करें

चंद कोंपलें निकली थीं, बारिश- ए- इश्क़ से बंजर जमीन में
दिली ख्वाहिश है आज, सुपर्द- ए- आतिश सारी फसल करें

ये तसब्बुर जेहन को फिर बारहा, रहता है करता  खाज़िल
अपनी आग-ए-खुन्नस में तबाह क्यूं कर हम नई नसल करें

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...