अब जबकि वो जज़्वा ही नही तो क्यों आरजू-ए-वसल करें
भूल कर हुस्न-ओ-शवाब, नज़र तुमको आखिरी ग़ज़ल करें
भिगो कर इस नामुराद- मनहूस चेहरे को सैल-ए-सरिश्क में
हल्का हो जाए गुबार-ए-जिगर पुरशिश कोशिश असल करें
चंद कोंपलें निकली थीं, बारिश- ए- इश्क़ से बंजर जमीन में
दिली ख्वाहिश है आज, सुपर्द- ए- आतिश सारी फसल करें
ये तसब्बुर जेहन को फिर बारहा, रहता है करता खाज़िल
अपनी आग-ए-खुन्नस में तबाह क्यूं कर हम नई नसल करें
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