करीब आते ही उसे जो आती, उबकाई को क्या नाम दूँ
तू ही बता दे ओ दिल-ए-नादाँ, हरजाई को क्या नाम दूँ
पास-पास रह कर भी हम दोनों यूं लगता है मीलों दूर हैं
मिलन की रुत में हाल है ये, तब ज़ुदाई को क्या नाम दूँ
खुशी में भी अंदाज़-ए-गुप्तुगू नें दिल में नश्तर चुभो दिये
लम्हा-ए-ख़ुन्नस में छाई तुम पर, रुस्वाई को क्या नाम दूँ
मातम की ही धुन निकले, यकीन है नुक्स-ए-नफ़स नहीं
कशमकश में हूँ बड़ा मैं कि इस शहनाई को क्या नाम दूँ
अक्स मेरा तो जानता हूँ रहेगा लिपटा हुआ मेरे ही साथ
उभरती है जो उसके संग दूजी, परछाई को क्या नाम दूँ
जलन-सड़न की है मुश्क फैली वादी-ए-सबा में जोरदार
मेरा दिल है सही-सलामत, फिर पुरबाई को क्या नाम दूँ
.. मनोज मैहता
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