Monday, 10 April 2017

एहतराम है..!!

मेरी वफ़ादारियों का क्या यह ही ईनाम है
तेरी जुबाँ पे फ़कत मेरे दुश्मन का नाम है

सबकुछ करके भी मैं रहा नापाक काफ़िर
वो बिन नमाज़ पढ़े भी तेरा शाही इमाम है

इक बार तो सभी मुरीदों के दिल टटोल ले
उस ही से तो उन सबको शिकवे तमाम हैं

मुझसा नहीं मिलेगा मान जा मेरी भी बात
यूँ लाखों के हुज़ूम का तेरे पास इंतज़ाम है

मैं तेरा शागिर्द हूँ इस बात का है फ़ख्र मुझे
रब्ब से ज़्यादा तेरे लिये मन में एहतराम है
                                     ..मनोज मैहता

No comments:

Post a Comment

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...