Monday, 30 November 2015

Heart beats enthusiastically....

सीनें में जवाँ सा जोश भी है तबियत में और उल्लास भी है,
चँद भूली बिसरी घड़ियों की कड़ियाँ जुड़नें की आस भी है.

तेरा मुझको देखके यूँ खिलना,फिर झट गले से आ मिलना,
मेरी सजनी ऐसा लगता है ज्यों जारी अपना मधुमास ही है.

कुदरत ने खेल रचाया था, क्यों दिल से दिल उकताया था,
भूल गई हो तुम वो काला युग, ऐसा मुझको विश्वास भी है.

तुमने सँभाला ही नहीं मुझको बल्कि सँवारा भी है मुझको,
कुछ भी नहीं हूँ मैं भुला पाया, ख़ताओं का अहसास भी है.

यकीनन मेरे इन अल्फाज़ों, से बेकाबू हुई तेरी साँस भी है,
जिन मस्त मौज़ों पे तैरे हैं, हर बार ही उनकी तलाश भी है..
-------------------------मनोज मैहता--------------------------

Friday, 27 November 2015

How could I get his secrets revealed!!


उह़ियाँ ता मड़ा बड़ा घ़ान्दा पर साईया छड्डी कुथ्यो जाह़ँगा,
स्वासी गियो इतणीं बद्धी , पीपणिंयाँ सैह़ किह़ियाँ बजाँगा?

तिन्ह़ां दे चक्करे दा रौल़ा, चोंह़नीं पासयाँ बड़ा ह़ी पई ग्या,
उह़ियां  मेरा ढिड ह़ै कच्चा, दस्सा गल्ला किंह़ियाँ पचांगा?

छन्दयाँ मिन्नताँ करी करी नें, जीआ करदा मैं मरी मरी ने ,
अन्दरें अन्दरें सोच्ची जा दा, कोह़की मिंज्जो भी पत्यांगा !

जाह़नुआँ दे गैय ह़ड्ड छलोई अपण तिन्ह़ाँ दी बस नीं ह़ोई ,
माऊ दी सगँद ख़ाद्दी मितरो, ह़टी तिसा बत्ता नी जाह़ँगा !

गप्पा नें गप्प निकल़ी जाँद्दी, फूक्की जीभ फिसल़ी जाँद्दी,
माफ करी छड्ड इब्हैं मितरा, कदी नीं ह़ुण पल़चाई पाह़ँगा !

रती कि जे टेर सैह़ लाई दिन्दा, मुँह़ें मेरे फट्ट खुड़ाई दिन्दा,
मेरे भ़ेद सैह़ जाणदा सारे, मैं तिस्दयाँ किंह़ियाँ क़ढवाँगा ?
----------------------- मनोज मैहता ---------------------

Tuesday, 24 November 2015

Consider it confession Bindia

लो ज़िंदगी की एक और जिम्मेदारी निपट गई,
गुजश्ता दौर की चँद यादें जिगर से लिपट गईं ।

बढ़ गई थीं दूरियाँ यकीनन जो हमारे दरम्यान,
बालू के पहाड़ सी वो इक ही पल में मिट गईं ।

ख़ूब भटके हम बेख़ौफ,बेधड़क बियावानों में ,
हस्ती मगर हर बार तेरे, इर्दगिर्द ही सिमट गई ।

यूँ नहीं कि खुशी देने की तुझे मेरी मँशा न थी ,
बदहाली- तँगदिली जरा, थी मुझसे चिपट गई ।

तू जो खुश है तो मैं भी बेफिक्र हुआ फिरता हूँ ,
छोड़ चिंता को कि कोई और है मेरे निकट हुई ।
------------------  मनोज मैहता -------------------

Saturday, 21 November 2015

He kept burning his heart...

मनें दे फफोल़याँ बठयाल़दा ही रह़ी गया ,
मोटर गई चली, मैं निहाल़दा ही रह़ी गया .

ह़ुस्नें दे बजारे बिच, झ़पट्टयां मारी गै सारे ,
मैं नौल़ाँ सांह़ी यारो , ताल़दा ह़ी रह़ी गया.

चोरिया दी बँड्डी नें तिन्ह़ां खीस्से लैये भ़री,
रात थी न्ह़ेरी मैं लम्फे बाल़दा ह़ी रह़ी गया.

नौंयाँ सूटाँ बूटाँ नें मितरां टौह़र थी कड्ढियो,
मैं पराणें फालड़ुयाँ ,खँगाल़दा ह़ी रह़ी गया.

मीटाँ दारुआँ छक्की, मस्तदे रैह़ सब भ़ाऊ,
सैह़ दुक्कु तिक्कुआं संभ़ाल़दा ह़ी रह़ी गया.

बड़े नखरयाँ दस्सी ह़ंड्डदी रह़ी ह़ोरसी नें सैह़
'मैहता' बचारा काल़जे जाल़दा ह़ी रह़ी गया ..
------------------मनोज मैहता ------------------

Saturday, 14 November 2015

Wasted my time in useless jobs

न अदाब ही कहा न ही सलाम किया ,
हर बात का मुझ पर ही इल्ज़ाम दिया ।

करते रहे जिसकी लम्बी उम्र की दुआ ,
उसनें ही तो हमारा जीना हराम किया ।

जिस नाकाम के चर्चे शहर में आम थे ,
उसी नें बस्ती में हासिल मुकाम किया ।

हमें ग़म है ताउम्र, काम न कोई किया ,
सारा वक्त हुज्ज़तों में ही तमाम किया ।

यारों की मेहरबानियाँ मुझपर हुईं बड़ी ,
हर बेज़ा हरकत को मेरे ही नाम किया ।।
-----------------मनोज मैहता ---------------

Monday, 9 November 2015

Be aware Mr. Modi...!!

बड़ा हो हल्ला करते थे जब हम कहते थे बड़बोला है,
बेगुसराय से भाजपा सांसद, अब यही वाणी बोला है  ।
शत्रुघ्न सिन्हा और भोला सिंह नें , खूब चढ़ाये पारे हैं ,
बोले बिहार चुनाव हम मोदी के बड़बोलेपन से हारे हैं ।
आर के सिंह जी ने भी केंद्र को सरेआम ललकारा है ,
किसी 'विजयवर्गीय' नें , शॉटगन को कुत्ता पुकारा है ।
खुश है हर राष्ट्रवादी, प्रसन्नचित आज हर बिहारी है ..,
पार्टी मूर्छावस्था में तो क्यों ब्रिटेन जाने की तैयारी है ?
शाँता जी ने भी सरेआम, नसीहत यही दे डाली है .,
सूखने लगा यह वट- वृक्ष, काँपी हर डाली डाली है !!
डी एन ए बिहारियों का आज सबके सिर चढ़ बोला है,
विश्वास फासीवादियों का अाज बुरी तरह से डोला है ।
लालू को शैतान कहा तो इसका फल खुद ही पाया है,
मोदी -शाह की जोड़ी को, धूल का अहसास कराया है ।
सबको नैप्थय पर धकेलने की योजना हुई धराशायी है,
मोदी जी जरा सँभल जाईए अब आपकी बारी आई है।

-------------------- मनोज मैहता -----------------------------

Sunday, 8 November 2015

He is crossing the limits of hatred

नफरतों की सब ही हदें लाँघता है ,
कोई मेरी मौत की दुआ माँगता है ।

उसकी सनक है या तुनकमिजाज़ी?
छोड़कर उँगली, गिरेबान थामता है ।

दिखावट को यूँ तो बनता है बेचारा ,
असल में है क्या, वो ख़ुद जानता है ।

जिसकी नज़र में , कभी मैं ख़ुदा था,
आज वोही मुझको शैतान मानता है ।

महलों में रहना जिसे बहुत पसंद था,
आजकल कूचों की ख़ाक छानता है ।।
-------------मनोज मैहता -----------------

Tuesday, 3 November 2015

Might is right

जाह़लु ते नाँ मेरा बिकणां  लग्गा ,
जोसी भ़ी टिपड़ुए दिखणां लग्गा ।

कबल्ले ख्याल थे खोपरें  बड़यो ,
भ़ुल्ले सब जाह़लु लिखणां लग्गा ।

सुभ कारजे जो जाँदयां दिख्खी ,
सरीक ठस्से नें छिक्कणां लग्गा ।

लुगड़े छक्की साह़ंन था  बणयां ,
ह़ुण कजो जँग्घ़ां जिकणां लग्गा?

सिगटे बिच था मिठड़ा  लग्गदा ,
धूँ  चिलमाँ  दा  तिखणां  लग्गा ।

छड्ड भँग्गा  देयां  सूट्टयाँ  मितरा ,
मींजूए च ह़ुण एह़ चिटणां लग्गा ।।

--------- मनोज मैहता -------------

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...