न अदाब ही कहा न ही सलाम किया ,
हर बात का मुझ पर ही इल्ज़ाम दिया ।
करते रहे जिसकी लम्बी उम्र की दुआ ,
उसनें ही तो हमारा जीना हराम किया ।
जिस नाकाम के चर्चे शहर में आम थे ,
उसी नें बस्ती में हासिल मुकाम किया ।
हमें ग़म है ताउम्र, काम न कोई किया ,
सारा वक्त हुज्ज़तों में ही तमाम किया ।
यारों की मेहरबानियाँ मुझपर हुईं बड़ी ,
हर बेज़ा हरकत को मेरे ही नाम किया ।।
-----------------मनोज मैहता ---------------
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