Saturday, 22 April 2017

क्या नाम दूँ...!!

करीब आते ही उसे जो आती, उबकाई को क्या नाम दूँ
तू ही बता दे ओ दिल-ए-नादाँ,  हरजाई को क्या नाम दूँ

पास-पास रह कर भी हम दोनों यूं लगता है मीलों दूर हैं
मिलन की रुत में हाल है ये,  तब ज़ुदाई को क्या नाम दूँ

खुशी में भी अंदाज़-ए-गुप्तुगू नें दिल में नश्तर चुभो दिये
लम्हा-ए-ख़ुन्नस में छाई तुम पर,  रुस्वाई को क्या नाम दूँ

मातम की ही धुन निकले, यकीन है नुक्स-ए-नफ़स नहीं
कशमकश में हूँ बड़ा मैं कि इस शहनाई को क्या नाम दूँ

अक्स मेरा तो जानता हूँ रहेगा लिपटा हुआ मेरे ही साथ
उभरती है जो उसके संग दूजी, परछाई को क्या नाम दूँ

जलन-सड़न की है मुश्क फैली वादी-ए-सबा में जोरदार
मेरा दिल है सही-सलामत, फिर पुरबाई को क्या नाम दूँ
.. मनोज मैहता

Monday, 10 April 2017

एहतराम है..!!

मेरी वफ़ादारियों का क्या यह ही ईनाम है
तेरी जुबाँ पे फ़कत मेरे दुश्मन का नाम है

सबकुछ करके भी मैं रहा नापाक काफ़िर
वो बिन नमाज़ पढ़े भी तेरा शाही इमाम है

इक बार तो सभी मुरीदों के दिल टटोल ले
उस ही से तो उन सबको शिकवे तमाम हैं

मुझसा नहीं मिलेगा मान जा मेरी भी बात
यूँ लाखों के हुज़ूम का तेरे पास इंतज़ाम है

मैं तेरा शागिर्द हूँ इस बात का है फ़ख्र मुझे
रब्ब से ज़्यादा तेरे लिये मन में एहतराम है
                                     ..मनोज मैहता

Friday, 7 April 2017

अदालतों से पूछिये .. !!

बाइज्ज़त क्यूँ बरी हो रहे मुज़रिम अदालतों से पूछिये
वतन पर मिटनें वालों की बेज़ा गई शहादतों से पूछिये

हिंदोस्ताँ उनके बाप-दादा की जागीर तो नहीं हरगिज़
जो खेल रहे हैं हमसे रोज उनकी सियासतों से पूछिये

इस सर ज़मीं ने धूप-ओ-सायबाँ अनगनित दौर देखे हैं
मुझ पे अग़र यकीं नहीं तो उजड़ी रियासतों से पूछिये

ये कायदे कानून दुनिया के हैं क्या गरीबों के लिये बनें
रईसों के आगे जो घुटने टेकती  उन ताक़तों से पूछिये
                                                    
कुछ फ़ाकाकश हैं क्यों यहाँ  फुटपाथों पर नँगे सो रहे
मदमस्त अध-नंगों की  महफिलों या दावतों से पूछिये
                                                     ..मनोज मैहता

Game

To win despite the odds remains my only aim, For life has dealt us every breath without a name. The cards were turned a little late, a littl...