Wednesday, 10 September 2025

चले भी हम




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ग़ज़ल

चले भी हम, दौड़े भी हम, मगर शायद बेवक़्त
तभी तो मंज़िल न मिली, थक गए हम कम्बख़्त।

किसी ने राह दिखाई, किसी ने धोखा दिया,
मगर न थमी ये चाह, दिल रहा उम्र-भर तंग।

हवाएँ रुख़ बदलती रहीं सदा हमारी ओर,
जहाज़ डूब ही गया, तैरते रहे हम संग।

ख़्वाब आँखों में सजाकर भी हकीक़तों से जले,
उम्र के हर मोड़ पर बजती रही वही जंग।

ज़िंदगी इक किताब है मगर अधूरी सी,
हर सफ़ा पूछता है — आखिर कहाँ है रंग?

थकान की धुंध में गुम हैं हमारे क़दम,
कभी लगे सवेरा है, कभी लगे अब ढल गया ढंग।

कभी तो रूठी हुई किस्मत मुस्कुरा देगी,
कभी तो टूटा हुआ दिल पा सकेगा उमंग।

मुक़द्दर आज़माएँ या फिर सुकून ढूँढें,
सफ़र की राह में चलता रहे यही ढंग।


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