महास्तोत्र: अनंत स्रोत (मंत्रमय संस्करण)
1
सूरज की रौशनी, चाँद की छाया,
सितारों की झिलमिल, नील गगन की माया।
2
धरती, पानी, पर्वतों की ऊँचाई,
सब उसी में समाये, सब उसी का दर्पण साई।
3
फूलों की खुशबू, पत्तों की हरियाली,
नदियों की कलकल, झरनों की गूँज प्याली।
4
प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक जीव की धड़कन,
उसकी अनुभूति, उसकी छाया, हर दिशा में सजगन।
5
हे अनंत! बताओ, तुम्हें किसने रचा?
जिसने सब कुछ बनाया, उसका स्रोत कहाँ छिपा?
6
क्या उसका भी कोई रचनाकार है,
या वह स्वयं अनादि, अनंत, अविनाशी, निर्विकार है?
7
मैंने देखा पहाड़ों की चोटियों में,
सन्नाटों में, हवाओं में, बरसात की बूँदों में।
8
हर रूप में उसका प्रतिबिंब, हर लहर में उसका गीत,
पर उसकी वास्तविकता—अनंत रहस्य, अज्ञेय, असीमित।
9
मनुष्य ने उसे ईश्वर कहा, ब्रह्म कहा, अल्लाह कहा,
कभी “मैं” में, कभी “तू” में, कभी “हम” में देखा।
10
पर वह रहस्यमय बना, अज्ञेय और असीम,
सभी नामों से परे, अद्भुत और अकल्पनीय।
11
क्या वह शक्ति है जो सब कुछ चलाती है?
या वह स्वयं निरपेक्ष, निर्गुण, निराकार है?
12
समय, दिशा, सीमा—सब उसके अधीन,
पर वह स्वयं अनंत, अज्ञात, अकल्पनीय, असीमितीन।
13
सागर की गहराई में, हर लहर की लय में,
हम उसके स्वर का अनुभव करते, उसकी छाया में।
14
पर्वतों की चोटियों पर, हिम की सफेदी में,
सूरज की पहली किरण में, हर प्राण की विद्युती में।
15
सत्य, प्रेम, शक्ति—सब उसकी उपस्थिति में प्रकट,
और हम बस उसकी महिमा का स्मरण करते अविरत।
16
मनुष्य की जिज्ञासा, उसकी पीड़ा और प्रसन्नता,
सब उसी के रहस्य के इर्द-गिर्द घूमती है निरंतर।
17
हे स्रोत! तुम्हारा कोई अंत नहीं, कोई आरंभ नहीं,
हम तुम्हें देख सकते हैं, अनुभव कर सकते हैं कहीं कहीं।
18
फूलों की शाखाओं पर, पक्षियों की उड़ान में,
हवा की सरसराहट में, हर धड़कन की पहचान में।
19
सब कुछ उसी की छाया, सब कुछ उसी का प्रतिबिंब,
सृष्टि का हर रंग, हर स्वर, उसकी महिमा का संकेत।
20
जो देखा और न देखा, जो पाया और खोया,
सब उसी का रूप, सब उसी की छाया।
21
आकाश की नीली चादर, धूप की सुनहरी किरण,
हर तत्व में उसकी छवि, हर जीवन में उसका संग।
22
मनुष्य ने सोचा, लिखा, गाया, पूजा की,
पर वह रहस्य बना, अनंत, अज्ञेय, अविनाशी।
23
कभी उसे सूरज के रूप में जाना,
कभी चाँद की शीतल छाया में देखा, कभी नदियों में पाया।
24
हर रूप में उसकी अनुभूति, हर स्वर में उसका संकेत,
फिर भी उसका वास्तविक स्वरूप—अनंत, अव्यक्त, अद्वितीय।
25
हे अनंत स्रोत! तुम्हारी महिमा अपरम्पार,
तुम्हारा स्वर अमिट, तुम्हारा प्रकाश अनंत संसार।
26
सृष्टि के नियमों में, जीवन के हर रूप में,
हम तुम्हारे दर्शन को महसूस करते, तुम्हारे संगीत में।
27
मनुष्य की आशा, उसकी चिंता, उसका विश्वास,
सब उसी की छाया, सब उसी का स्वरुप विशाल।
28
मैं नमन करता हूँ उस असीम, अनादि स्रोत को,
जिसके बिना यह सृष्टि न होती, न जीवन का कोई मोड़।
29
जो भी देखा, जो भी अनुभव किया, सब उसी का दर्पण है,
हमारे प्रश्न, हमारी जिज्ञासा—सब उसकी छाया है।
30
सूरज की रौशनी में, चाँद की शीतलता में,
सितारों की झिलमिल में, नील गगन की विशालता में।
31
धरती, पानी, हरियाली, पर्वतों की ऊँचाई में,
सब उसी में समाये, सब उसी का प्रतिबिंब दिखाई में।
32
हमारे ह्रदय की धड़कन, हमारे मन की गति,
सब उसी की अनुभूति, सब उसी का संगीत।
33
हे सर्जक! तेरा रूप अद्भुत, तेरा ज्ञान अपार,
सृष्टि की हर किरण में तू, हर दिल की पुकार।
34
हमारी आत्मा की खोज में तू है मार्गदर्शक,
हमारी पीड़ा और प्रसन्नता में तू है सहचर।
35
मैं नमन करता हूँ उस असीम, अज्ञेय, अनादि स्रोत को,
जिसके बिना यह सृष्टि न होती, न जीवन का कोई मोड़।
36
जो देखा और न देखा, जो पाया और खोया,
सब उसी का रूप, सब उसी की छाया।
37
सत्य, प्रेम, शक्ति—सब उसकी उपस्थिति में प्रकट,
और हम बस उसकी छाया को नमन करते अविरत।
38
सूरज, चाँद, सितारे, नील गगन, धरती, पानी,
सब उसी के हैं, सब उसी का रूप, सब उसी की कहानी।
39
हे अनंत! बताओ, तुम्हें किसने रचा?
जिसने सब कुछ बनाया, उसका स्रोत कहाँ छिपा?
40
क्या उसका भी कोई रचनाकार है,
या वह स्वयं अनादि, अनंत, अविनाशी, निर्विकार है?
41
मनुष्य ने सोचा, लिखा, गाया, पूजा की,
पर वह रहस्य बना, अनंत, अज्ञेय, अविनाशी।
42
कभी उसे सूरज के रूप में जाना,
कभी चाँद की शीतल छाया में देखा, कभी नदियों में पाया।
43
हर रूप में उसकी अनुभूति, हर स्वर में उसका संकेत,
फिर भी उसका वास्तविक स्वरूप—अनंत, अव्यक्त, अद्वितीय।
44
शायद उसे जानना ही मानवता है,
शायद उसे पकड़ना असंभव है, यही सच्चाई है।
45
सृष्टि की हर बूंद में, हर सांस में,
हम केवल उसका झरोखा देख सकते हैं, उसका अंश पा सकते हैं।
46
फिर भी मैं पूछता हूँ, हर दिन, हर पल,
उस अनंत रहस्य से: “कौन है वह, और कहाँ से आया?”
47
सूरज, चाँद, सितारे—सब उसी के प्रतीक,
धरती, पानी, नील गगन—उसकी महिमा की साक्षी।
48
हे अनंत! तुम्हारी शक्ति, तुम्हारी छाया,
सब कुछ तुम्हारा, सब कुछ तुम्हारे द्वारा पाया।
49
हमारी आत्मा, हमारे मन, हमारे विचार,
सब उसी में घुले, सब उसी का आधार।
50
सूरज की रौशनी, चाँद की शीतल छाया,
सितारों की झिलमिल, नील गगन की माया।
अनंत स्रोत! तुम्हारा नाम अमर रहे,
सृष्टि की हर धड़कन में तुम्हारा स्वर गूंजे!
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