Sunday, 14 September 2025

जब लत बने हद से ज्यादा



विस्तारित नुक्कड़ नाटक: "जब लत बने हद से ज़्यादा"

पात्र:

  • अजय – युवा लड़का, जो खेल की लत में फंसा है
  • माया – उसकी छोटी बहन, जो उसकी चिंता करती है
  • श्रीराम – स्कूल टीचर, समझदार और संवेदनशील
  • ममता आंटी – पड़ोस की दादी, समाज की आवाज़
  • राकेश – अजय का दोस्त, जो नशे की आदत में फंसा है
  • अजय के माता-पिता – जो चिंता में हैं
  • समाज के लोग – दर्शक और पड़ोसी

दृश्य 1: घर का कमरा

(अजय मोबाइल या गेम में पूरी तरह डूबा है, माया बार-बार बोलती है लेकिन ध्यान नहीं देता)

माया: भैया, तुम्हारे कमरे में कब से बैठे हो? बाहर खेलो, थोड़ी हवा खाओ।
अजय: (गुस्से में) माया, तुम मेरी बात मत टोको। मैं बस गेम खेल रहा हूँ।

माया: (फिक्र से) ये लत है भैया, मैं देखती हूँ, तुम्हें खुद भी पता नहीं चलता कि कब रुकना है।
अजय: (चुप हो जाता है, लेकिन नजरें नीची)


दृश्य 2: स्कूल का मैदान

(टीचर श्रीराम बच्चों से बात कर रहे हैं)

श्रीराम: बच्चों, हम सभी की कुछ आदतें होती हैं, लेकिन अगर कोई आदत हमारी जिंदगी पर हावी हो जाए, तो वह लत बन जाती है।
(राकेश आता है, उसका चेहरा थका हुआ और नशे का असर दिखता है)
राकेश: (धीमी आवाज़ में) सर, मैं समझता हूँ कि मैं नशे का आदी हो चुका हूँ। अब खुद को संभालना मुश्किल है।

श्रीराम: (संवेदनशीलता से) बेटा, ये लड़ाई अकेले नहीं लड़नी होती। हम सब साथ हैं। परिवार, स्कूल, समाज, सब मिलकर मदद करेंगे।


दृश्य 3: घर का बैठक कमरा

(अजय के माता-पिता चिंता में बात कर रहे हैं)

माँ: हमें पता है कि अजय खेल में ज्यादा डूबा हुआ है, लेकिन क्या ये उससे ज्यादा बड़ी समस्या है?
पिता: हमें समझना होगा कि ये सिर्फ खेल नहीं, एक मानसिक अवस्था है। हमें उसकी मदद करनी होगी, न कि केवल डांटना।


दृश्य 4: समाज की सभा

(ममता आंटी और पड़ोसी लोग एकत्र हैं)

ममता आंटी: बच्चों की ऐसी आदतें और लतें सिर्फ उनके लिए नहीं, पूरे समाज के लिए खतरा हैं।
पड़ोसी 1: तो क्या सरकार कुछ करेगी?
ममता आंटी: अगर हम आवाज़ उठाएंगे तो जरूर। स्कूलों में ऐसी बच्चों की सूची बनेगी, सही पहचान होगी, मदद के रास्ते खुलेंगे।


दृश्य 5: घर के बाहर

(अजय और माया बातचीत कर रहे हैं)

अजय: माया, मैंने सोचा है कि मैं खुद को बदलने की कोशिश करूंगा। ये लत मुझे और हमारे परिवार को तोड़ रही है।
माया: हम सब तुम्हारे साथ हैं भैया, डरना नहीं।


समापन (सभी पात्र मंच पर आकर):

सभी मिलकर:
"लत कोई सिर्फ नशा नहीं, ये है एक मानसिक जाल,
समझो, पहचानो, साथ दो — यही है सही हाल।
बच्चों को प्यार दो, समाज को जागृत करो,
तभी हमारी आने वाली पीढ़ी खुशहाल होगी।"



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