वो जो काले रंग में चमक रहा,
जैसे युगों से कोई ध्यानमग्न रहा।
हजारों वर्षों से जो अडिग खड़ा,
वो क्या सिर्फ पत्थर है, या महादेव बड़ा?
कहते हैं, मक्का की वो दीवार है,
पर भीतर से कोई रुद्र की पुकार है।
ना नाम लिखा, ना मंत्र जपा,
फिर भी हर दिल में कुछ थमता सा लगा।
चाँदी के फ्रेम में बंधा साकार,
शिव के लिंग रूप का अद्भुत आकार।
ना आरती, ना शंख, ना घँटी की गूंज,
फिर भी हर मन में उठे कोई सूक्ष्म तर्जुमा।
हजर-अल-अस्वद कहें या शिव का चिन्ह,
दोनों में है भक्ति का मौन राग-गान।
जहाँ एक तरफ़ है तवाफ़ की डगर,
वहीं दूसरी ओर है त्रिपुंड का सफर।
क्या फर्क पड़े, किसने क्या कहा,
जब भाव ही प्रभु तक पहुँचा रहा।
नाम अलग हों, रूप भिन्न सही,
पर क्या ईश्वर कभी सीमित रहा कहीं?
🕉️ "शिव सर्वत्र हैं – रूप में, बिना रूप के।
जो देखे श्रद्धा से, उसे दिखते हैं हर रूप में।" 🌙
No comments:
Post a Comment