Saturday, 27 September 2025

मक्का में हजर अल असवद साक्षात शिव


वह जो काले रंग में दमक रहा,
युगों से तपस्वी-सा चमक रहा।
काबा की दीवारों में बसा हुआ,
क्या वह केवल पत्थर है, थमा हुआ?

ना दीप जले, न शंख बजे,
फिर भी भावों से मन सजें।
चाँदी की माला में बँधा हुआ,
ज्यों त्रिपुंड का बिंब सजा हुआ।

ना मंत्र, ना पूजन, ना बेलपत्र,
फिर भी लगे वहाँ शिव की दृष्टि पात्र।
तवाफ़ करें जो प्रेम सहित,
वो पाए निःशब्द शिव का स्नेहित।

कोई कहे “हजर”, कोई कहे “लिंग”,
भिन्न हों नाम, पर एक ही रंग।
रूप भले भिन्न हो भाषा से,
पर भाव बहे प्रभु की आशा से।

क्या महादेव हैं केवल कैलास में ?
क्या वह न रहें किसी और वास में?
जो भाव जहाँ भी उठे पूर्ण हो,
वहीं शिवत्व का बीज मूल हो।


🌺 “शिव हैं शून्य, शिव हैं स्वरूप,
सर्वत्र व्याप्त, अनादि अनूप।”
🌺



No comments:

Post a Comment

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...