Wednesday, 31 December 2025

अस्थिसंचयन मंत्र

नीचे सनातन धर्म में अस्थि-संचयन की संपूर्ण, विस्तृत एवं क्रमबद्ध विधि दी जा रही है। यह विवरण शास्त्रीय, भावात्मक और व्यवहारिक—तीनों दृष्टि से “लंबा” और पूर्ण है।
🕉️ अस्थि-संचयन : शास्त्रीय महत्व
अस्थि-संचयन मृतक के दाह संस्कार के बाद किया जाने वाला अत्यंत पवित्र कर्म है। मान्यता है कि अस्थियों में सूक्ष्म प्राण-तत्व शेष रहता है। उन्हें श्रद्धा सहित एकत्र कर पवित्र नदियों में विसर्जित करने से आत्मा को पितृलोक की यात्रा में शांति मिलती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार —
“अस्थि-संचयन व गंगाजल-स्पर्श से प्रेतयोनि शीघ्र समाप्त होती है।”
🌿 अस्थि-संचयन का समय
सामान्यतः तीसरे, चौथे या सातवें दिन
यदि नदी तट दूर हो — तो दसवें या तेरहवें दिन
सूर्योदय के बाद, दोपहर से पूर्व श्रेष्ठ माना गया है
🌸 आवश्यक सामग्री
कुशा
गंगाजल
दूध
तिल
पुष्प
सफेद वस्त्र
तांबे या मिट्टी का पात्र
चावल
धूप-दीप
🔱 अस्थि-संचयन की संपूर्ण विधि व मंत्र
1️⃣ आचमन व शुद्धि
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ॐ केशवाय नमः ।
ॐ नारायणाय नमः ।
ॐ माधवाय नमः ॥
2️⃣ संकल्प मंत्र (अत्यंत आवश्यक)
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ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ।
अद्य श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य
विष्णोः आज्ञया
(देश-काल-नाम-गोत्र) स्थितः
अहं (कर्ता का नाम)
अमुक गोत्रस्य अमुक नाम्नः
मृतस्य प्रेतात्मनः
अस्थि-संचयनं करिष्ये ।
3️⃣ भूमि को प्रणाम
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ॐ माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ।
नमस्ते पृथिवी देवी
क्षमस्व मां शरणागतम् ॥
4️⃣ अस्थि उठाते समय मंत्र
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ॐ भूमिर्भूमिना संधत्ता
धृता धरण्याः क्षमस्व ।
अस्य प्रेतस्य अस्थीनि
गृहाण मम शान्तये ॥
5️⃣ दूध व जल से अस्थि शुद्धि
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ॐ आपो हिष्ठा मयोभुवः
ता न ऊर्जे दधातन ।
महेरणाय चक्षसे ॥
6️⃣ अस्थि पात्र में रखते समय
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ॐ अस्थीनि संहृत्य
पुनः पुण्ये जले क्षिपे ।
यत्र गच्छन्तु देवाश्च
तत्र गच्छतु मे पिता ॥
7️⃣ सूर्य मंत्र (आत्मा को प्रकाश मार्ग हेतु)
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ॐ उदुत्यं जातवेदसं
देवं वहन्ति केतवः ।
दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥
8️⃣ पितृ गायत्री
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ॐ पितृदेवाय विद्महे
महापुरुषाय धीमहि ।
तन्नः पितृः प्रचोदयात् ॥
9️⃣ तिल अर्पण मंत्र
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ॐ तिलैः पितॄन् तर्पयामि
स्वधा नमः ॥
🔔 भावात्मक पितृ-स्मरण
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हे पिता / हे माता !
यदि जीवन में कोई अपराध,
कोई कटु वचन या अवज्ञा हुई हो
तो उसे क्षमा करें।
आपकी आत्मा को
सद्गति, शांति और मोक्ष प्राप्त हो।
🔱 शांति पाठ (अंतिम)
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ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः
पृथिवी शान्तिरापः शान्तिः ।
ओषधयः शान्तिः
वनस्पतयः शान्तिः
विश्वे देवाः शान्तिः
ब्रह्म शान्तिः
सर्वं शान्तिः
शान्तिरेव शान्तिः ॥
🌊 अस्थि विसर्जन से पूर्व मंत्र
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ॐ गंगे च यमुने चैव
गोदावरी सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरी
जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥
🌼 अंत में
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ॐ स्वधास्तु ।
पितरः तृप्यन्तु ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
यदि आप चाहें, मैं आपको
✔ हरिद्वार / गया / प्रयाग / नासिक की अलग-अलग परंपरा
✔ स्त्री-पुरुष मृतक के अनुसार भिन्न मंत्र
✔ सरल हिन्दी अर्थ सहित पूरा पाठ
✔ PDF या पूजा-पाठ पुस्तिका शैली में
भी तैयार कर सकता हूँ।
आप बताइए — किस रूप में चाहिए।

पिंडदान मन्त्र

ठीक है। नीचे सनातन धर्मानुसार पिंडदान की संपूर्ण पारंपरिक विधि क्रमवार दी जा रही है। यह विधि गया / हरिद्वार / प्रयाग—तीनों में मूलतः समान मानी जाती है (स्थानीय आचार्य उच्चारण में थोड़ा अंतर कराते हैं)।
🔱 पिंडदान की संपूर्ण विधि (मंत्र सहित)
1️⃣ मंगलाचरण (आरंभ में)
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ श्री गणेशाय नमः।
ॐ श्री गुरुभ्यो नमः।
2️⃣ संकल्प मंत्र (मुख्य)
(दक्षिणमुख होकर, हाथ में जल–तिल–अक्षत लेकर)
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ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः।
अद्य श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य
विष्णोः आज्ञया
ब्रह्मणः द्वितीय परार्धे
श्वेतवाराह कल्पे
वैवस्वत मन्वन्तरे
अष्टाविंशतितमे कलियुगे
प्रथमे चरणे
जम्बूद्वीपे भारतवर्षे
आर्यावर्ते अमुक प्रदेशे
अमुक तीर्थे

अमुक गोत्रोत्पन्नस्य
अमुक नाम्नः पितुः / मातुः / पितामहस्य
प्रेतमोक्षार्थं
पिंडदानं करिष्ये।
(अंत में)
👉 ॐ तत्सत्।
3️⃣ पितृ-आह्वान मंत्र
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ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।
ॐ पितामहाय स्वधा नमः।
ॐ प्रपितामहाय स्वधा नमः।
4️⃣ पिंड अर्पण मंत्र (प्रत्येक पिंड पर)
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इदं पिंडं
अमुक नाम्ने पित्रे
स्वधा नमः।
(तीन पिंड हों तो—पिता, पितामह, प्रपितामह के नाम से)
5️⃣ जल-तर्पण मंत्र
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ॐ पितृभ्यः स्वधा।
ॐ पितृभ्यः स्वधा।
ॐ पितृभ्यः स्वधा।
6️⃣ अक्षय तृप्ति मंत्र
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अक्षयं भवतु।
अक्षयं भवतु।
अक्षयं भवतु।
7️⃣ क्षमा प्रार्थना (अत्यंत आवश्यक)
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मंत्रहीनं क्रियाहीनं
भक्तिहीनं जनार्दन।
यत् कृतं तु मया देव
परिपूर्णं तदस्तु मे॥
8️⃣ अंतिम शांति मंत्र
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
🌾 विशेष मान्यताएँ
पिंड में चावल, जौ, तिल, घी, शहद का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है।
पिंडदान अमावस्या, पितृपक्ष, गया-श्राद्ध, हरिद्वार में विशेष फलदायी होता है।
कहा गया है—
“गयाश्राद्धं विनाऽन्यत् नास्ति”
(गया में किया पिंडदान सर्वश्रेष्ठ माना गया)
यदि आप चाहें तो मैं
✔ केवल गया-श्राद्ध की विशिष्ट विधि,
✔ पितृपक्ष के 16 दिनों की तिथिवार जानकारी,
✔ या सरल हिंदी में भावार्थ सहित छोटा संस्करण
भी तैयार कर दूँ।
आप बताइए। 🙏

Sunday, 21 December 2025

सरेआम नहीं करता

नाहक़ ही मैं उसको बदनाम नहीं करता,
सलीके से वो इक भी काम नहीं करता।

बोलता है बहुत मगर निभाता नहीं कुछ,
बेमतलब वो कभी भी सलाम नहीं करता।

लफ़्ज़ जब बोझ बनें, सच अपना वज़्न खो दे,
वो बयानात में भी कोई काम नहीं करता।
जिसे आईने से भी ख़ौफ़ हो अपने ही अक्स का,
वो दूसरों के गुनाह का इल्ज़ाम नहीं करता।
जहाँ अक़्ल से पहले मुनाफ़ा सलामत हो,
वहाँ दिल किसी रिश्ते को अंजाम नहीं करता।
मैंने सीख लिया है ख़ामोशी का फ़लसफ़ा भी,
हर बात का चर्चा अब सरेआम नहीं करता।
मेरे पास पुरानी यादों की बहुत-सी रद्दी है,
चंद सिक्कों के लिए मगर नीलाम नहीं करता।
“मैहता” ने समझा है इस शहर का दस्तूर,
जो ख़ुद को बचा ले वही बदनाम नहीं करता।

Monday, 15 December 2025

when your child grows


When your child grows,
His very face softly glows—
Not from borrowed dreams,
But the truth his spirit knows.

Let him wander, let him fall,
Let him rise by inner call;
Time is only passing dust,
Man is the river—pain and trust.

Do not cage him in your fear,
Nor script the path you hold so dear;
Love is not control or rule,
It’s faith in lessons life will school.

For clocks may tick and seasons close,
Yet man still flows where meaning goes;
When your child becomes his own,
Your love is seen—not overthrown.


**I and my shadow**



I and My Shadow

— Manoj Mehta

I and my shadow often talk to each other,
Two sides of one soul born from one another.
I move with questions, it walks with doubt,
Together we search what life’s about.

In darkness my shadow seems to be lost,
But in candlelight looks like a giant ghost.
When light is absent, forms decay,
Yet a fragile flame makes fears display.

I ask of the light, why it must reveal,
It asks of the dark what it tries to conceal.
I look for answers steady and clear,
It listens to truths I refuse to hear.

In total night I vanish from sight,
No shape, no measure of wrong or right.
But give me a spark, humble and small,
My hidden doubts rise vast and tall.

Sometimes it catches even my attraction,
When I see in mirror it as reflection.
I pause and wonder which face is mine,
The lived-in self or the outlined sign.

Is self the image the glass displays,
Or the silent watcher behind the gaze?
If I admire what looks me through,
Am I the shadow—or is it me too?

I claim I am free, guided by choice,
It speaks of fate in a quieter voice.
I trust my logic, sharp and bright,
It trusts the pull beyond my sight.

The brighter the flame, the longer the shade,
The deeper the fears my mind has made.
What rests in dark, untested, deep,
Wakes when awareness breaks its sleep.

When crowds applaud and call me strong,
It walks beside me, silent, long.
When courage bends and faith feels thin,
It knows where every fall begins.

At dusk we meet on equal ground,
No height, no depth, no self is crowned.
The sun retreats, the questions stay,
Neither of us turns away.

At last I learn through shadowed sight,
It is not my enemy nor my fight.
I am the seeker shaped by light,
My shadow—the truth revealed at night.

Wednesday, 10 December 2025

Jalian wala bagh


O Punjab, where brave hearts rise and never choose to bend, 
Where courage flows like rivers and the tyrants always end. 
Your fields recall the footsteps of heroes history can’t erase, 
Your soil still holds the memory of a nation’s fiery grace. 

When Britain, drunk on victory after the world had burned in war, 
Returned to rule with iron laws and chains that scarred the core, 
The Rowlatt Act they forged to choke the voice they couldn’t own, 
A justice mocked, a freedom crushed, a cruelty fully shown. 

But out of Amritsar rose two men whose souls refused to break, 
Dr. Saifuddin Kitchlew and Satyapal, awake for country’s sake. 
They spoke against oppression with a courage clean and true, 
And stirred a fire in countless hearts the British never knew. 

So fearful rulers seized them both, believing fear would reign, 
They thought by jailing patriots they’d dominate again. 
But prisons cannot cage a storm nor silence rising breath, 
Their capture lit a spark that marched the valley close to death. 

For April thirteenth dawned with joy, Vaisakhi’s festive air, 
Families gathered peacefully, unarmed and unaware. 
Yet Dyer entered Jallianwala with hatred cold and vast, 
He blocked the gates, raised rifles high, and ordered firing fast. 

No warning fell upon the crowd before the lead storm came, 
No mercy touched the soldier hands that fired without shame. 
The cries of innocents rose up like thunder in the sky, 
While walls turned red and shadows wept where freedom came to die. 

But even in that slaughtered ground the spirit didn’t tire, 
Each martyr fell a warrior, their blood became a fire. 
A flame that spread through India, a vow in every soul, 
That tyranny would one day burn and justice claim its toll. 

For Udham Singh across the seas held memory like a spear, 
He waited years and crossed an ocean carrying no fear. 
He struck the heart of empire where their pride had dared to stand, 
A reckoning delivered clean by his unshaking hand. 

O Kitchlew! O Satyapal! your courage lit the way, 
You stood when many trembled, you fought though night was grey. 
Your names became the thunder that woke a sleeping land, 
Your spirit forged the soldiers who rose with burning hand. 

Jallianwala’s wounded earth still roars from age to age, 
A wound that carved a nation’s oath in history’s living page. 
Empires fall like crumbling dust when justice takes its stand, 
But martyrs rise eternal, guarding every grain of land. 

So let this Ode be sharp as flame and fierce as freedom’s call, 
A tribute to the brave who chose to rise and never crawl. 
For every bullet Britain fired, a thousand hearts awoke, 
And India learned that tyrants die while truth survives unbroke. 

जलियांवाला बाग


जिनके सीने में धधकती है देशप्रेम की आग,
उन्हें हरगिज़ नहीं भूलेगा जालियांवाला बाग।
हमारे दमन के लिए गोरे रौलट एक्ट लाए थे,
पहले विश्व युद्ध से चूंकि वो कसमसाए थे।

सूत्रों में बंधी इंसानियत को ये साम्राज्यवादी चूसना चाहते थे,
हमारी चिंगारी बुझाकर हमें मजबूरी में झुकाना चाहते थे।
पर उन्हें क्या पता था—भारत की रगों में पानी नहीं, लावा बहता है,
जेलें बना लो जितनी चाहे—ये देश हर जंजीर से बड़ा है, रहता है।

अमृतसर की धरा पर जब किचलू ने हुंकार भरी,
सतपाल ने सत्य के दीप जलाए, भीड़ उमड़ पड़ी।
धर्म-नवमी के जुलूस में जब दोनों ने एक ही प्याले से जल पिया,
अंग्रेज़ों ने देखा—उनका “फूट डालो” मंत्र वहीं मर गया, वहीं गिर गया।

उन दो नेताओं के पीछे पूरी पंजाब-धरती चलती थी,
उनकी आवाज में वो आग थी जो ज़ुल्म के महलों को गलती थी।
इसीलिए कायर हुकूमत ने रात के चोर की तरह दोनों को उठाया,
धर्मशाला की बंद गाड़ी में ले जाकर उन्हें कैद पिंजरे में ठूंसा-पछताया।

लोगों ने जब सुना—“किचलू-सतपाल बंद हैं”—
पंजाब का खून खौल उठा, दिल में बगावत बंद है।
जनता फूटी नदी की तरह उमड़ी जालियांवाला बाग में,
निहत्थी थी, पर इरादा फौलादी था हर धड़कन में, हर राग में।

और उधर आता है डायर—सैनिकों की कतार लेकर,
एक कायर, जो बच्चों तक से डरता था हथियार लेकर।
जितनी गोलियाँ थीं, उतनी ही जिंदगियाँ रौंद दीं,
दीवारों ने ज़ख्म समेटे, धरती ने चीखें पोंछ लीं।

अरे डायर! तूने समझा था खून बहाकर हम डर जाएँगे,
तू भूल गया—हम वो हैं जो लहू में भी आज़ादी के इरादे उगाएँगे।
तेरी गोलियाँ शरीर भेद सकीं, मगर इच्छाशक्ति नहीं;
तेरी बंदूकें भीड़ मार सकीं, पर आंदोलन की गहराई नहीं।

किचलू-सतपाल की गिरफ्तारी क्यों हुई?
क्योंकि अंग्रेज़ों को डर था उन दो नामों से—
डर था उनकी एकता से, उनकी लोकप्रियता से,
डर था कि ये दोनों मिलकर भारत को जगा देंगे,
और साम्राज्य का ताज हिंदुस्तान की आँधी में उड़ जाएगा।

डर सच भी हुआ—
जालियांवाला बाग के खून ने जलती मशाल बनकर,
भगत सिंह को अंगार बनाया,
राजगुरु-सुखदेव को रणभूमि का नारा बनाया,
उधम सिंह ने लंदन में जाकर वह हिसाब भी चुकता कर आया,
जिसने साम्राज्यवाद की रूह तक दहला डाला, कंपा डाला।

तारीखें बदलती रहीं, पर बाग की दीवारें आज भी बोलती हैं—
“हम गवाह हैं उस दिन की, जब इंसानियत रो पड़ी थी।
हम गवाह हैं उस रात के, जब आज़ादी जाग पड़ी थी।”

किचलू की कलम, सतपाल की सेवा, और जनता की जंग—
तीनों मिलकर बने वो तूफ़ान, जिसने साम्राज्य को कर दिया दफ़्न।
गुलामी की ईंटों से बनी थी वो सरकार,
पर हमने उसे खंडहर में बदला—अपने शहीदों के उधार उतार-उतार।

हम वो लोग हैं जिनके इरादों को मिट्टी भी सलाम करती है,
जिनके खून में rebellion है, जिनकी सांस में आज़ादी धरती है।
जालियांवाला बाग सिर्फ़ एक स्थान नहीं—एक चेतावनी है,
कि भारतवासी कभी किसी साम्राज्य की गुलामी स्वीकार नहीं करने देंगे—
चाहे कीमत अपनी जान ही क्यों न हो।

Tuesday, 9 December 2025

O poetry

O Poetry! You are not barren art,
You rise and flow straight from the heart. When the poet writes, your words take flight,Turning quiet moments into beams of light.

O Love! You are the muse so bright,
Every line you touch feels warm and right. Some verses heal, some pierce the soul,
Some make the broken pieces whole.

Through moonlit nights and sunny days,
Your magic shines in endless ways.
A glance, a sigh, a touch, a stare,
All find their voice within your care.

O Poetry! Your rhythm holds the heart,
Your melody makes every pain depart.
Even tears that fall like rain so sweet
Become small joys when your verses meet.

Let the pen move, let the words sing,
Let every line beat like guitar's string .
For where you live, hearts confide,
And Love eternal walks beside.

O Poetry! O Love! I sing your praise,
Your gentle light fills all my days.
From quiet muse to blazing art,
Forever shall your flame dwell in the heart.

What's poetry



Poetry is not barren but definitely an art,
When the poet is in mood, words flow out from heart.
They rise like sparks from a secret flame,
Turning simple moments into love’s sweetest game.

Emotions shape verses — tender or fierce,
Some lines heal wounds, a few deeply pierce.
When thoughts overflow, they blossom into a song,
And playing with words makes fragile hearts strong.

When love is the muse, every rhyme becomes bright,
Every phrase feels warmer, every pause feels right.
For in the whispers of poetry, lovers impart
A world that begins and ends in the heart.



How do people suddenly change



How do people change suddenly, turning warm hearts into stone? 
How do they leave us as if we were never their own? 
They speak of love like a promise kept, then vanish without a trace, 
Leaving us shattered and silent, while they rush to another place. 

They play the part so perfectly, every word a practiced art,
But walk away so ruthlessly, tearing pieces from our heart.
Yet through their betrayal, we learn what’s false and what is true,
For those who change so speedily were never meant for you.

changed people



How do people change suddenly, turning warm hearts into stone?
How do they leave us as if we were never their own? 
They speak of love like a promise kept, then vanish without a trace, 
Leaving us shattered and silent, while they rush to another place. 


They play the part so perfectly, every word a practiced art,
But walk away so ruthlessly, tearing pieces from our heart.
Yet through their betrayal, we learn what’s false and what is true,
For those who change so speedily were never meant for you

___Manoj Mehta___

बदल कैसे जाते हैं

पता नहीं लोग इकदम बदल कैसे जाते हैं,
उन्हें ही छोड़ देते  जिन्हें  अपना  बताते हैं।

कल तक क़समों में सच की दुहाई देते थे,
आज उनके ताने तीर बनकर चुभे जाते हैं।

चेहरे पे मासूमियत, दिल में इरादा ए कत्ल 
वो रिश्तों को भी मोहरों की तरह चलाते हैं।

बुरे दौर में हमने जिनकी हर सू देखरेख की 
वो ही यार इन दिनों अपने फायदे गिनाते हैं।

हम समझते थे वफ़ा कोई चीज़ होती है,
पर यहाँ तो लोग मौक़े देखकर ही मुस्कुराते हैं।

दिल तोड़ने का हुनर भी क्या खूब आया है उन्हें,
जैसे किसी बात पर कोई पछतावा ही नहीं जताते हैं।

हमने सच में जो था, वही दिल से दिया,
और उन्होंने झूठ में भी अपनी जीत के झंडे गाड़ आते हैं।

अब सीख लिया हमने भी हर मुस्कान पर यक़ीन न करना,
क्योंकि लोग ज़रा-सा मौसम बदलते ही रंग दिखाते हैं।

हम तो आज भी उसी मोड़ पर खड़े साफ़-दिल हैं,
पर लोग चलने से पहले भी सौ बहाने बनाते हैं।

और हां…
अब किसी के जाने का ग़म नहीं होता हमें,
क्योंकि जो छोड़कर चला जाए—
वो कभी ‘अपना’ था ही नहीं, बस हम ही भूल जाते हैं।

Sunday, 7 December 2025

अमृतसर महाकाव्य



✨ स्वर्ण मंदिर – एक महाकाव्य ✨

प्रथम सर्ग – नानक का उदय

जब धरती पर फैला तम भारी, झूठ-अभिमान का जंगली जाल,
मानव मानव से दूर हुआ, मन का हुआ पत्थर-सा हाल।
तब रैण सबेरा लेकर आया, कार्तिक की पावन भोर,
रवि-सी प्रकट हुई एक ज्योति, नानक नाम अमर विभोर।

उन्होंने शांति की वंशी बाँधी, करुणा का संदेश सुनाया,
“इक ओंकार” का सत्य महामंत्र, जग में अमृत-धार बहाया।
उनके कदम जहाँ पड़े, वहाँ प्रेम के अंकुर फूटा,
अमृतसर की मिट्टी ने भी, श्रद्धा का दीपक छूटा।


द्वितीय सर्ग – रामदास द्वारा अमृतसर का उद्भव

चतुर्थ गुरु रामदास पधारे, सौम्य प्रभा के धाम,
देखी धरती एक अनोखी, शांत, परंतु अनाम।
उन्होंने सरोवर की कल्पना, प्रेम तरंगों से सींची,
संगत उतरी सेवा करने, मिट्टी पावन हो गई नींवी।

कुदरत ने भी आसमान से, बरखा-सी आशीष बरसाई,
सरोवर की तरंगों ने, मानवता में नयी ज्योति जगाई।
अमृत का सर बना पावन, जिसकी लहरें सत्य घोले,
जिसके जल में डूब नहाए, मन के सब संशय टटे खोले।


तृतीय सर्ग – हरमंदिर की नींव

समय बीता पाँचवें गुरु का, अर्जुन देव दयाल,
जिनके मुख से झरती वाणी, जैसे गंगा-सी निर्मल धार।
उन्होंने रचा एक मंदिर, सब जाति-धर्म से परे,
जहाँ विनम्रता हो सीढ़ी, प्रेम हो मंदिर के द्वार खुले।

दिन पावन था, शुभ घड़ी आई, नींव रखी जो मियां मीर ने,
हिंदू-मुस्लिम एकत्व का दीप, इतिहास में गहरे घीरे।
चार दिशा के द्वार बनाए, निष्काम-सेवा का वास,
जहाँ आए जो कोई थका हुआ, पाए मन का विश्वास।


चतुर्थ सर्ग – आदिग्रंथ का प्रकाश

साल सोलह सौ चार का, दिवस हुआ अद्भुत पावन,
हरमंदिर में पहली बार, रखा गया ग्रंथ महान।
भीतर गूँजी अमृत ध्वनि, कीर्तन-रस की मधुर पुकार,
भाई गुरदास प्रथम ग्रंथी, बने ज्ञान के अंबर तार।

गुरबाणी की शीतल छाया, मन के ताप को हरती गई,
भक्तों की आँखों में ज्योति, करुणा से फिर भरती गई।
सरोवर में झिलमिल प्रतिबिंब, जैसे सागर में चाँद नहा,
धरती स्वर्ग समान हुई, जब वाणी ने रूप अलौकिक गढ़ा।


पंचम सर्ग – संघर्ष, समर और पुनर्निर्माण

पर समय ने घनघोर अंधेरा भी, इस मंदिर की राह में फैका,
अब्दाली के क्रूर प्रहारों ने, मंदिर को कई बार तोड़ा, ढेका।
किन्तु सिखों की हिम्मत पर्वत, उनका मन वज्र समान,
जितनी बार गिरा धाम यह, उतनी बार उठा दुगुना महान।

रक्त-रंजित वे रातें भी थीं, जब पंजा सिंह, बंदा वीर,
मंदिर के द्वारों पर पहरे थे, कौम संभाले, धीर-गंभीर।
विनाश की राख में भी, आशा की ज्वाला सोई थी,
गुरु की कृपा से हर बार, हरमंदिर में नयी प्राण फूँकी थी।


षष्ठ सर्ग – रणजीत सिंह का स्वर्ण आवरण

उन्नीसवीं सदी का उजियारा, रणजीत सिंह का यश-प्रसार,
उदार सिंह-सम्राट ने देखा, हरमंदिर का तेज अपार।
तब लिया प्रण एक महान —
“सोने से मंडप सजाऊँगा।”
नीला अम्बर छूते गुम्बद पर,
सुनहरी दुनिया बसाऊँगा।

कई वर्ष का प्रयास अनूठा, सोने की परतें चमकीं,
मंदिर को मिला वह वैभव, जिसकी कथाएँ दिशाओं में थमीं।
सूर्य किरण जब गिरती छत पर, मानो अमृत चमक उठे,
गंगा-जैसी शांति बरसती, श्रद्धा के रसे-रसक उठे।


सप्तम सर्ग – आधुनिक युग और अमर मानवता

समय की धारा चलती जाती, सुख-दुख आते-जाते हैं,
कभी घाव इतिहास के गहरे, मंदिर पर भी लग जाते हैं।
परंतु हर बार सेवा-भाव, हर बार संगत की शान,
फिर सुंदर रूप में जगमगाया, हरमंदिर का स्वर्ण स्थान।

आज भी सरोवर की धारा, मृदुल शांति का गीत सुनाती,
लंगर की थाली मानवता को, प्रेम-मिश्री से भर भर जाती।
चार दरवाज़े कहते प्रतिदिन —
“आओ, तुम सब मेरे हो,”
धर्म, जाति, वर्ग से ऊपर,
मानवता के सागर में खो।


उपसंहार – अमृत ज्योति

स्वर्ण मंदिर केवल धातु नहीं,
न कोई शस्त्र, न कोई रूप,
यह तो मानवता की ज्योति है,
जिसका न क्षय, न कोई स्वरूप।

जहाँ नाम-सिमरन की धुनें,
अमर आकाश को छू जातीं,
जहाँ सरोवर के जल में
आत्माएँ निर्मल हो आतीं।

यही है हरमंदिर का महाकाव्य —
सोने का नहीं,
मानवता का अमृत-दीप,
जो सदियों तक जग में जलता रहेगा।



अमृतसर कविता



✨ स्वर्ण मंदिर – इतिहास की काव्य कथा ✨

अमृत तल की पावन धरती, नानक ने बीज बोए थे,
शांति, प्रेम, बराबरी के सपने जग में जो रोए थे।
आवाज़ लगी इक ईश गुणों की, संगत-कीर्तन जागा था,
अमृतसर की मिट्टी में तब, हरमन प्यारा भागा था।

रामदास गुरु ने फिर आकर, सरोवर की रेखा खींची,
खुशियों की इक ज्योति जली थी, दिल की हर उलझन सींची।
खुदाई में संगत उतरी, सेवा का सागर उमड़ा,
मानवता का फूल खिला था, दीन-दुखी सब संग जुड़ा।

अर्जुन देव ने मंदिर की नींव, मियां मीर से रखवाई,
चार दिशा के द्वार बनाकर, दुनिया को राह दिखलाई।
नीचे रखकर चरण पथारा, ऊँचे अहं को तोड़ा था,
हर वर्ग, हर जाति के दिल ने, गुरु का आंगन छोड़ा था।

आदि ग्रंथ का प्रथम प्रकाश, हरमंदिर में दीप जला,
भाई गुरदास जी ने पढ़कर, ज्ञान का अमृत फिर बहा।
कीर्तन की मधुर धुनों में, मन का अंधियारा खोया,
सरोवर में झिलमिल करता, रब का स्वरूप ही सोया।

फिर आईं आँधियाँ अफगानों की, अब्दाली का कहर चला,
कई बार मंदिर टूटा, पर हर बार फिर से जड़ से उगा।
सिख जवानों के साहस पर, इतिहास भी पर्वत झुका,
चूर हुए पत्थर लाख मगर, विश्वास कभी ना रुका।

आया रणजीत सिंह का दौर, सोने की वर्षा होने लगी,
दुनिया ने तब पहली दफ़ा, “स्वर्ण मंदिर” की रौनक जगी।
गुम्बद चमके सूर्य समान, परिक्रमा का मन हरसा,
सेवा-भाव, भक्ति-धारा ने, हर दिल में चिर दीप रखा।

बीते वर्षों ने देखा दुख, घाव लगे इतिहास में,
फिर भी मंदिर खड़ा रहा, इकता के विश्वास में।
सरोवर अब भी अमृत सा, घुलता मन की वेदना,
दुनिया भर से लोग आते, पाने को शांति-रेणा।

आज भी लंगर की थाली में, दुनिया का रूहानी राग,
हाथ जोड़कर बैठा मानव, मिट जाता हर भेद-फास।
चार दरवाजों से बहती है, मानवता की एक हवा,
स्वर्ण मंदिर की पावन जै, जग में देता प्रेम-दवा।


✨ निष्कर्ष ✨

स्वर्ण मंदिर की कथा नहीं,
एक प्रार्थना है अनंत सी;
सोने-चांदी में क्या रखा —
सबसे सुंदर उसकी मानवता है,
जो हर दिल में बसती है।



Monday, 1 December 2025

डैडी जी

यह रही 

अपनों का खो जाना,
हमसे ज़ुदा हो जाना,
मन की उजली दीवारों पर
अँधेरों को सजा देता है।

समय के सूने दालानों में
कदमों की आहट खो जाती है,
जिस्म तो चलता है आगे,
पर रूह कहीं पीछे रह जाती है।

वैराग्य की परछाइयाँ
धीरे-धीरे मन को ढँक लेती हैं,
जो कल फूलों-सी कोमल थीं
आज पत्थर-सी सख़्त लगने लगती हैं।

रास्ते भी अजनबी लगते हैं,
मंज़िलें भी धुंध में ढल जाती हैं,
अपनों के बिछड़ने का दुख
हर मोड़ पर सांसें चुभलाती हैं।

मेरे डैडी भी क्या थे,
कुदरत की दुआ थे,
उनकी आँखों में जैसे
मेरे कल की तराशी हुई राहें थीं।

उनके शब्दों में सुकून था,
उनके होने में भरोसा था,
मानो दुनिया के हर तुफ़ान से
लिपटकर बचा लेने का वादा था।

जब मैं लड़खड़ाता था,
वो मुस्कुराकर थाम लेते थे,
मेरी हर ठिठकी उम्मीद को
अपने हौंसलों से नाम देते थे।

लेकिन जब सहारा ही छूट गया,
तो जैसे धरती भी डगमगा गई,
आसमान का वो तारा टूटकर
सीधे दिल में उतरता चला गया।

जीवन की ठहरी हुई नदी में
नए किनारे नहीं मिलते,
बीते पलों की परछाइयाँ
आंखों में गहरा धुंधलका भर देतीं।

दर्द जब शब्द बनकर उठे,
तो वैराग्य का दीप जलता है,
और मन—एक खोया यात्री—
राहों से भी अपना नाता तोड़ देता है।

पर डैडी की यादें अब भी
धड़कनों में बारिश-सी बरसती हैं,
उनकी आवाज़ की गूंज
अब भी खामोशियों को तरसती है।

वो कहीं दूर नहीं गए,
बस एक परदा-सा पड़ा है बीच,
हमारी सांसें यहाँ चलती हैं,
उनकी दुआएँ वहाँ से पहुँचती हैं।

हर कठिन रात में,
उनकी परछाईं कंधे पर हाथ बन जाती है,
हर कसक में उनका नाम
एक मरहम की तरह लग जाता है

जो लोग दुआ बनकर जीवन में उतरते हैं,
वो मौत से भी कभी नहीं जाते,
उनके जाने भर से
उनकी मौजूदगी नहीं मिट जाती।

वो हवा की तरह होते हैं,
दिखते नहीं—पर जीने को बना देते हैं,
वो यादों की तरह होते हैं,
कभी दर्द…कभी सहारा बन जाते हैं।

मेरे डैडी भी क्या थे—
सच में कुदरत की दुआ थे,
आज भी हर धड़कन में
वही दुआ बनकर जीते हैं।



Monday, 24 November 2025

*अब अच्छी नहीं लगती*

दरख़्तों के तनों पर छाल अब अच्छी नहीं लगती,
उसकी नागिन जैसी चाल अब अच्छी नहीं लगती।

वो वक़्त गुज़र गया  जब मैं  झट ही माँग लेता था,
मुआफ़ी की डरपोक ढाल अब अच्छी नहीं लगती।

केएफ़सी , पीज़ा के इस होम डिलीवरी के दौर में 
घर की पकाई कोई दाल अब अच्छी नहीं लगती।

बाज़ार का सारा काम जब से सिमट गया मॉलों में,
एतबार की मस्त हड़ताल अब अच्छी नहीं लगती।

दे दो एक लेटेस्ट मोबाइल स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी को,
उसके हाथों में उफ़ मशाल अब अच्छी नहीं लगती।

पहले इस हाल में देख कर बहुत सुकून मिलता था, 
वो ऐसी बेबस ओ बदहाल अब अच्छी नहीं लगती।




Friday, 21 November 2025

बड़ोह मंडल

ग्राम केंद्र प्रमुख, ग्राम केंद्र प्रभारी
बूथ अध्यक्ष
युवा मोर्चा अध्यक्ष रुद्राक्ष राजपूत
एससी मोर्चा अध्यक्ष जगदीश गुप्ता
युवा मोर्चा संयोजक, ग्राम केंद्र प्रभारी, प्रमुख, बूथ अध्यक्ष
ज़िला मोर्चा संयोजक 

Wednesday, 19 November 2025

भारत में पहला मुसलमान

“भारत में पहला मुसलमान कौन था?” – यह सवाल इतिहास में कई तरह से समझा जाता है, क्योंकि “पहला मुसलमान” अलग-अलग संदर्भों में अलग लोगों को कहा जा सकता है।
नीचे चारों दृष्टियों से स्पष्ट उत्तर दिया है:


1. भारत की भूमि पर आने वाला पहला मुसलमान (ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित)

मालिक इब्न दीनार और उनके साथ आए व्यापारी

लगभग 628 ईस्वी (7वीं शताब्दी) में अरब के कुछ मुसलमान व्यापारी मालिक इब्न दीनार के नेतृत्व में केरल (मलाबार तट) आए।
इन्हें भारत की धरती पर आने वाले शुरुआती मुसलमान माना जाता है।

इनके आने से चेन्नामालेश्‍वरी (मस्जिद) जैसी भारत की सबसे पुरानी मस्जिदों का निर्माण हुआ (उसी काल में चेन्नामायल मस्जिद/चेरामन जुम्मा मस्जिद मानी जाती है)।


2. भारत में इस्लाम स्वीकार करने वाला पहला व्यक्ति

परंपरा के अनुसार केरल के चेर राजा:

चेरामन पेरुमाल (Cheraman Perumal)

  • कहा जाता है कि वे अरब जाकर पैग़म्बर मुहम्मद के संपर्क में आए
  • इस्लाम स्वीकार करके "ताजुद्दीन" नाम लिया
  • भारत लौटते समय रास्ते में उनका निधन हुआ
  • केरल में उनके सम्मान में पुरानी मस्जिदें बनाई गईं

हालाँकि यह कथा ऐतिहासिक और लोक परंपरा का मिश्रण है।


3. उत्तर भारत में इस्लाम फैलाने वाले प्रारम्भिक मुसलमान

मुहम्मद बिन क़ासिम (712 ई.)

सिंध और मुल्तान पर चढ़ाई करने वाला पहला मुस्लिम सेनापति, जिसने यहाँ मुस्लिम शासन की शुरुआत की—
पर यह “पहला मुसलमान” नहीं, बल्कि पहला मुस्लिम सेनापति था जो भारत में पहुँचा।


4. सूफियों के माध्यम से भारत में इस्लाम का प्रसार करने वाले प्रथम लोग

ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (12वीं शताब्दी)

उन्होंने अजमेर में चिश्ती सिलसिले का प्रसार किया और सूफीवाद के माध्यम से लाखों लोगों ने इस्लाम जाना।


निष्कर्ष (सीधा उत्तर)

👉 भारत की भूमि पर आने वाले शुरुआती मुसलमान: अरब व्यापारी, प्रमुख – मालिक इब्न दीनार (628 ई.)
👉 भारत में इस्लाम स्वीकार करने वाले पहले व्यक्ति (परंपरागत कथा): चेरामन पेरुमाल
👉 उत्तर भारत में पहली मुस्लिम फौज का आगमन: मुहम्मद बिन क़ासिम (712 ई.)

अगर आप इनमें से किसी हिस्से को विस्तार से जानना चाहें (जैसे चेरामन पेरुमाल की कथा, पहली मस्जिद का इतिहास, या अरब व्यापारियों के आगमन), तो बताइए।


“भारत में पहला मुसलमान कौन था?” – यह सवाल इतिहास में कई तरह से समझा जाता है, क्योंकि “पहला मुसलमान” अलग-अलग संदर्भों में अलग लोगों को कहा जा सकता है।
नीचे चारों दृष्टियों से स्पष्ट उत्तर दिया है:


1. भारत की भूमि पर आने वाला पहला मुसलमान (ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित)

मालिक इब्न दीनार और उनके साथ आए व्यापारी

लगभग 628 ईस्वी (7वीं शताब्दी) में अरब के कुछ मुसलमान व्यापारी मालिक इब्न दीनार के नेतृत्व में केरल (मलाबार तट) आए।
इन्हें भारत की धरती पर आने वाले शुरुआती मुसलमान माना जाता है।

इनके आने से चेन्नामालेश्‍वरी (मस्जिद) जैसी भारत की सबसे पुरानी मस्जिदों का निर्माण हुआ (उसी काल में चेन्नामायल मस्जिद/चेरामन जुम्मा मस्जिद मानी जाती है)।


2. भारत में इस्लाम स्वीकार करने वाला पहला व्यक्ति

परंपरा के अनुसार केरल के चेर राजा:

चेरामन पेरुमाल (Cheraman Perumal)

  • कहा जाता है कि वे अरब जाकर पैग़म्बर मुहम्मद के संपर्क में आए
  • इस्लाम स्वीकार करके "ताजुद्दीन" नाम लिया
  • भारत लौटते समय रास्ते में उनका निधन हुआ
  • केरल में उनके सम्मान में पुरानी मस्जिदें बनाई गईं

हालाँकि यह कथा ऐतिहासिक और लोक परंपरा का मिश्रण है।


3. उत्तर भारत में इस्लाम फैलाने वाले प्रारम्भिक मुसलमान

मुहम्मद बिन क़ासिम (712 ई.)

सिंध और मुल्तान पर चढ़ाई करने वाला पहला मुस्लिम सेनापति, जिसने यहाँ मुस्लिम शासन की शुरुआत की—
पर यह “पहला मुसलमान” नहीं, बल्कि पहला मुस्लिम सेनापति था जो भारत में पहुँचा।


4. सूफियों के माध्यम से भारत में इस्लाम का प्रसार करने वाले प्रथम लोग

ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (12वीं शताब्दी)

उन्होंने अजमेर में चिश्ती सिलसिले का प्रसार किया और सूफीवाद के माध्यम से लाखों लोगों ने इस्लाम जाना।


निष्कर्ष (सीधा उत्तर)

👉 भारत की भूमि पर आने वाले शुरुआती मुसलमान: अरब व्यापारी, प्रमुख – मालिक इब्न दीनार (628 ई.)
👉 भारत में इस्लाम स्वीकार करने वाले पहले व्यक्ति (परंपरागत कथा): चेरामन पेरुमाल
👉 उत्तर भारत में पहली मुस्लिम फौज का आगमन: मुहम्मद बिन क़ासिम (712 ई.)

अगर आप इनमें से किसी हिस्से को विस्तार से जानना चाहें (जैसे चेरामन पेरुमाल की कथा, पहली मस्जिद का इतिहास, या अरब व्यापारियों के आगमन), तो बताइए।

Thursday, 6 November 2025

CONTENT ON THE SHELF



🌿 Content on the Shelf
— by Manoj Mehta

I don’t need a post to prove myself,
I’d rather stay quiet, content on the shelf.
The world may shout of name and fame,
But peace resides beyond that game.

Let others chase their shining crown,
I find my worth when I sit down.
In silence, I hear my truest song,
No crowd decides where I belong.

For glory fades like evening light,
But calm within still burns so bright.
So don’t be worried and manipulate,
I sympathize with your wretched state.

And when the dust of pride shall fall,
You’ll find the shelf outshines it all.



Monday, 3 November 2025

नशे में जाने के मुख्य कारण

नशे (Drugs / Alcohol / Addiction) में जाने के मुख्य कारण कई सामाजिक, मानसिक और व्यक्तिगत स्तरों पर होते हैं। नीचे इन्हें विस्तार से बताया गया है —


🌱 1. जिज्ञासा या प्रयोग की भावना (Curiosity & Experimentation)

  • अक्सर युवा यह सोचकर नशा आज़माते हैं कि “एक बार ट्राय करने से कुछ नहीं होगा।”
  • दोस्तों के बीच “कूल” दिखने की चाह भी बड़ी वजह बन जाती है।
  • धीरे-धीरे आदत लग जाती है और फिर व्यक्ति निर्भर (dependent) हो जाता है।

👥 2. मित्र मंडली और सामाजिक दबाव (Peer Pressure)

  • दोस्तों या साथियों का प्रभाव बहुत गहरा होता है।
  • “ना” कहने की हिम्मत न होना व्यक्ति को गलत दिशा में ले जा सकता है।
  • कई बार नशे को “मज़े की चीज़” बताकर दूसरों को फँसाया जाता है।

💔 3. मानसिक तनाव और अवसाद (Stress, Depression & Anxiety)

  • जीवन की परेशानियाँ, असफलताएँ, अकेलापन या पारिवारिक कलह से बचने के लिए कुछ लोग नशे का सहारा लेते हैं।
  • वे इसे “तनाव से मुक्ति” का साधन मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में यह समस्या को और बढ़ा देता है।

🏚️ 4. पारिवारिक माहौल (Family Background)

  • अगर परिवार में किसी सदस्य की नशे की लत हो, तो बच्चों पर उसका नकारात्मक असर पड़ता है।
  • माता-पिता के झगड़े, अभाव, या भावनात्मक दूरी भी बच्चों को गलत राह पर ले जा सकती है।

💰 5. आर्थिक असमानता और बेरोज़गारी (Unemployment & Frustration)

  • बेरोज़गारी, गरीबी या जीवन में उद्देश्य की कमी भी युवाओं को नशे की ओर धकेलती है।
  • “कुछ करने को नहीं है” — यह भावना विनाशकारी बन जाती है।

🎬 6. मीडिया और ग्लैमर की भूमिका (Media Influence)

  • फिल्मों, गानों या सोशल मीडिया पर नशे को “स्टाइल” या “मज़े की चीज़” की तरह दिखाया जाता है।
  • युवा प्रभावित होकर इसे अपनाने लगते हैं।

🧬 7. आनुवंशिक और जैविक कारण (Genetic & Biological Factors)

  • कुछ लोगों में नशे की आदत के लिए जैविक प्रवृत्ति (genetic tendency) होती है।
  • उनके मस्तिष्क में डोपामिन (dopamine) प्रणाली जल्दी प्रभावित होती है।

🧍‍♂️ 8. आत्मविश्वास की कमी (Lack of Self-Control & Confidence)

  • आत्मसम्मान की कमी, भय या असुरक्षा के कारण व्यक्ति नशे में झूठा साहस खोजता है।



“*असली समस्या नशा नहीं, असली समस्या एडिक्शन है*।”


1️⃣ एडिक्शन क्या है

एडिक्शन का मतलब है — किसी चीज़ को बार-बार, बहुतायत में, और नियंत्रण खोकर करना।
यह सिर्फ नशे तक सीमित नहीं है —
बल्कि मोबाइल, सोशल मीडिया, जुआ, खाना, या यहां तक कि काम की अति तक भी फैल सकती है।

नशा एक क्षणिक स्थिति है,
लेकिन एडिक्शन एक ऐसी आदत है जो इंसान की सोच, भावनाओं और जीवन के नियंत्रण को छीन लेती है।


2️⃣ असली समस्या — एडिक्शन क्यों?

नशा सिर्फ शरीर को प्रभावित करता है,
पर एडिक्शन मस्तिष्क और आत्मा दोनों को बांध देता है।
यह व्यक्ति को इतना निर्भर बना देता है कि
वह अब खुद नहीं चुनता कि क्या करना है —
उसका मस्तिष्क वही चुनता है जो नशा या आदत मांगती है।

यही कारण है कि असली लड़ाई नशे से नहीं,
बल्कि एडिक्शन से है —
क्योंकि नशा तो छूट सकता है,
पर एडिक्शन बदलने में समय, सहयोग और समझ की आवश्यकता होती है।


3️⃣ क्या एडिक्शन जन्मजात होती है?

वैज्ञानिकों के अनुसार कुछ लोगों के जीन ऐसे होते हैं जो नशे या दोहराए जाने वाले व्यवहारों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
इसलिए एडिक्शन की प्रवृत्ति आंशिक रूप से जन्मजात कही जा सकती है।

लेकिन सिर्फ जीन जिम्मेदार नहीं हैं —
हमारा पर्यावरण, संगत, मानसिक तनाव, और जीवन के अनुभव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
यानी, बीज तो शरीर में हो सकता है,
पर उसे पनपने के लिए मिट्टी और माहौल चाहिए।


4️⃣ बेहतर माहौल की भूमिका

अगर किसी व्यक्ति को सकारात्मक माहौल मिले —
प्यार भरा परिवार, अच्छे मित्र, आध्यात्मिकता, और जीवन का उद्देश्य —
तो एडिक्शन की ऊर्जा विनाश नहीं, सृजन का रूप ले सकती है।

जैसे कहा गया है —

“जैसी संगत, वैसी रंगत।”
जब वातावरण सुधरता है,
तो व्यक्ति अपने भीतर छिपी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगा देता है।


5️⃣ एडिक्शन को सही दिशा देना — असली इलाज

एडिक्शन में ऊर्जा होती है, समस्या केवल दिशा की होती है।
वही व्यक्ति जो नशे का आदी है,
अगर उसे सही मार्गदर्शन मिले,
तो वही ऊर्जा कला, संगीत, सेवा, या ध्यान में लगकर महानता का प्रतीक बन सकती है।

“बुरी लत को अच्छी लत से बदला जा सकता है।”

अगर कोई व्यक्ति रोज़ नशे के पीछे भागता था,
वही व्यक्ति अगर हर दिन ध्यान, व्यायाम, या सेवा में डूब जाए —
तो उसका मस्तिष्क वही आनंद महसूस करता है,
पर अब वह शुद्ध और स्थायी सुख होता है।


6️⃣ प्रेरक उदाहरण

इतिहास में ऐसे अनेक लोग हुए जिन्होंने अपनी प्रवृत्तियों को सकारात्मक दिशा में मोड़ा।
गौतम बुद्ध का ध्यान के प्रति लगाव,
स्वामी विवेकानंद का ज्ञान के प्रति जुनून,
महात्मा गांधी का सत्य और अहिंसा के प्रति समर्पण —
ये सब “अच्छी एडिक्शन” के उदाहरण हैं।


7️⃣ सारांश

एडिक्शन को खत्म करने की जरूरत नहीं,
बल्कि उसे सही दिशा देने की जरूरत है।
क्योंकि यह वही ऊर्जा है जो व्यक्ति को गिरा भी सकती है,
और उठाकर महान भी बना सकती है।

“एडिक्शन अपने आप में बुरा नहीं,
अगर दिशा सही हो तो यही जुनून महानता की ओर ले जाता है।”


8️⃣ समापन

तो साथियों, आइए हम सब यह संकल्प लें —
कि हम अपनी ऊर्जा, अपने जुनून और अपनी आदतों को
अच्छे कामों, अच्छे विचारों और अच्छे उद्देश्य में लगाएंगे।
क्योंकि नशा जीवन को अंधकार की ओर ले जाता है,
पर सही दिशा में एडिक्शन जीवन को रोशनी में बदल देती है।

“अगर लत लगानी ही है,
तो सेवा, प्रेम और सत्य की लगाओ —
क्योंकि यही वो एडिक्शन है
जो इंसान को भगवान के करीब ले जाती है।”



Friday, 31 October 2025

We depart and meet


We depart and meet,
We hug and greet,
Yet the spirits don’t part,
As He dwells in every heart.

Time may make us roam,
But all paths lead Home,
In every face we see,
The glimpse of Thee.

We laugh and cry,
We live, we die,
But beyond this fleeting play,
The Soul knows the way.

So when we depart, don’t weep,
The bond is vast and deep,
For love is not of clay
And It never fades away.

Thursday, 30 October 2025

My Inspiration My daddy


(An Ode by Manoj Mehta)

I carry his genes,
Almost in all streams,
But he believed in ends,
And I just in means.

He was my courage when I feared,
My voice when no one else had heard.
He never spoke of dreams or fame,
Yet lit my path with love’s soft flame.

His laughter still warms every room,
His silence whispers through the gloom.
He’d fix my world with steady hands,
And teach me life’s unspoken plans.

He worked so hard, yet never cried,
Kept pain and struggle deep inside.
And when I stumble, hear him say,
“Keep walking, son — you’ll find your way.”

No crown he wore, no throne he claimed,
But every heart his kindness named.
Now when I breathe, I feel him near —
My daddy’s soul forever here.

My promise, Dad — I’ll make you proud,
I’ll speak your truth, clear and loud.
Your love’s my guide, my heart, my creed,
In every act, I’ll sow your seed.

Monday, 27 October 2025

झरते ही नहीं


अदब से बात करें तो वो समझते ही नहीं,
अब मेरे लबों से फूल कभी झरते ही नहीं।

उमड़े थे जो बादल आँखों में चाँदनी बनकर,
वो अब हक़ीक़त में लौटकर बरसते ही नहीं।

थकान ओढ़े हुए लम्हे गुज़रते हैं चुपचाप,
दिल की गलियों में अब साज़ बजते ही नहीं।

कभी तो लोग थे जो हाल-ए-दिल समझ लेते,
अब आईने भी हमसे बात करते ही नहीं।

तूने सीखा है जुदाई का हुनर इस क़दर,
कि अब मिलन के भी मौसम सजते ही नहीं।

ज़रा सी बात पे दिल टूट जाता है ‘मनोज’,
वो पहले जैसे रिश्ते अब बनते ही नहीं।



Wednesday, 22 October 2025

शेख फरीद - - - - मौत पर


(मौत — फरीद की नजर से)

मिट्टी नू छोटी ना जाणीं,
एही जिंदगी दा राज है।
जिथों आया, ओथे जाणां,
एही रब दा अंदाज है।

फरीदा, मौतों ना डर,
एह वी रब दी रहमत ए।
जो रब विच रच गया पूरा,
उही जन्नत दी नेअमत ए।

अहंकार दी जे कंध गिरा लै,
उही मौतों पार लंगदा ए।
जिस ने आपा मार लिआ अपना,
उही हक़ विच रंगदा ए।

जद “मैं” मर गया अंदरों,
उस वेले जीवन जड़म्दा ए।
जो प्यार विच रब लै रलिआ,
उह सदा आबाद रहिंदा ए।

मौत ना अंत ए, ना हनेरा,
एह नूर दा इक दरिया ए।
बूँद मिली जद सामुंदर विच,
विसाल-ए-हक़ दा जरिया ए।



Tuesday, 21 October 2025

प्राचीन भारतीय विदुषियां


“प्राचीन भारतीय विदूषियां” — यानी वे महान भारतीय महिलाएँ जो केवल सुंदरता या गृहस्थ धर्म में ही नहीं, बल्कि ज्ञान, दर्शन, तर्क, राजनीति, और आध्यात्मिकता में भी पुरुषों के समान, बल्कि कई बार उनसे आगे रहीं।

नीचे मैं आपको प्रमुख प्राचीन भारतीय विदूषियों (ज्ञानी महिलाओं) का संक्षिप्त परिचय दे रहा हूँ 👇


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🌺 प्राचीन भारतीय विदूषियां (ज्ञानी महिलाएं)

1. गार्गी वाचक्नवी (Gargi Vachaknavi)

काल: वैदिक युग (बृहदारण्यक उपनिषद्)

विशेषता: याज्ञवल्क्य से ब्रह्मज्ञान पर शास्त्रार्थ करने वाली महाज्ञानी ब्राह्मण कन्या।

उन्होंने आत्मा, ब्रह्म और सृष्टि के रहस्यों पर प्रश्न उठाए — जो आज भी दर्शन का उच्चतम उदाहरण हैं।

उन्हें “वैदिक युग की दार्शनिक” कहा जाता है।



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2. मैत्रेयी (Maitreyi)

काल: वैदिक युग

संबंध: ऋषि याज्ञवल्क्य की पत्नी।

उपलब्धि: आत्मा और अमृतत्व के विषय में गहन प्रश्न पूछे —

> “हे नाथ! धन से अमरत्व नहीं मिलता, केवल ज्ञान से ही अमरत्व संभव है।”



उन्हें ज्ञानयोग की साधिका कहा गया है।



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3. अपाला (Apala)

काल: ऋग्वैदिक काल

परिचय: ऋग्वेद में स्तोत्र रचने वाली ऋषिकाओं में से एक।

अपने व्यक्तिगत दुःख को ज्ञान का साधन बनाकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया।

उन्होंने इन्द्र से संवाद कर आत्मशक्ति और साधना का महत्व बताया।



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4. विश्ववारा (Vishwavara)

काल: ऋग्वैदिक काल

उपलब्धि: ऋग्वेद के सूक्तों की रचयिता।

उन्हें काव्य और मंत्रविद्या में निपुण ऋषिका माना गया।



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5. घोषा (Ghosha)

काल: ऋग्वैदिक काल

परिचय: अपनी सुंदर स्तुति रचनाओं के लिए प्रसिद्ध।

उन्होंने इन्द्रदेव की स्तुति में दो सूक्त रचे।

वे स्त्री स्वतंत्रता और सम्मान की प्रतीक हैं।



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6. लोपामुद्रा (Lopamudra)

काल: प्राचीन वैदिक काल

संबंध: ऋषि अगस्त्य की पत्नी।

विशेषता: उन्होंने “काम और ब्रह्मज्ञान” के संतुलन पर गूढ़ प्रश्न पूछे।

कहा जाता है कि उनके प्रश्नों ने ऋषि अगस्त्य को गृहस्थ आश्रम की महिमा समझाई।



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7. मदालसा (Madalasa)

काल: पुराणिक काल (मार्कण्डेय पुराण)

विशेषता: आत्मज्ञान देने वाली माता — जिन्होंने अपने पुत्रों को लोरी में ब्रह्मज्ञान दिया।

वे “विदूषी मातृत्व की प्रतीक” हैं।



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8. सुलभा (Sulabha)

काल: महाभारत काल

उपलब्धि: जनक राजा से शास्त्रार्थ कर आत्मा की स्वतंत्रता और समत्व पर अद्भुत संवाद किया।

वे योग, तर्क और वेदान्त दर्शन में पारंगत थीं।



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9. कौंडिन्य पत्नी काप्या (Kapiya Patni)

काल: वैदिक युग

विशेषता: ऋग्वेद में उनके नाम से सूक्त रचे गए हैं।

उन्हें कृषि, पर्यावरण और देवी उपासना की ज्ञाता कहा गया है।



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10. गालव माता (Galava Mata)

काल: उत्तरवैदिक युग

विशेषता: अपने पुत्र ऋषि गालव को वेदविद्या सिखाने वाली ज्ञानी माता।



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✨ संक्षेप में

> “भारत की प्राचीन विदूषियां यह प्रमाण हैं कि यहाँ नारी को ज्ञान, तप, तर्क और धर्म में समान अधिकार था।
वे केवल प्रेरणा नहीं — परंपरा की ज्योति हैं।”




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Saturday, 11 October 2025

Ode to Boldness


High above the ground,
Boldness knows no bound.
It rides the wind where courage sings,
And dares to touch forbidden things.

It burns within the hearts that strive,
Whose dreams are fierce, whose souls alive.
No trembling fear, no chain, no wall,
Can still the will that dares to call.

Through storm and shadow, doubt and night,
Boldness whispers, “Rise to light.”
Each step defies the known, the small—
And turns the world, remakes it all.

So rise, O heart, and claim your height,
Where vision soars in fearless light.
For only those who brave the skies
Can teach the earth how to arise.

Sunday, 5 October 2025

Pension - A reward of life time



P.E.N.S.I.O.N. —
Post Employment Necessary Support in Old Age Needs,
It is reward of fortunate one’s young age deeds.

Years of duty, with heart and might,
Now bloom again in restful light.
A token of service, of faith, of grace,
A gentle smile on a seasoned face.

So cherish the peace that effort feeds —
For pension is the harvest of good age deeds. 


अच्छा हुआ


चलो अच्छा हुआ, वे छोड़ गये बीच राह में,
और ठंडक भी नहीं रही अब मेरी आह में।

अब पूछते हैं बार-बार, नाम  क्यों लेते हो,
जो कभी आ बैठे थे  उफ़,  ख़ुद पनाह में।

इश्क़ कम्बख्त शै ही यारों बहुत ख़राब है,
फ़र्क़ नहीं रखती  ये  ग़ुलाम और शाह में।

उनका जाना कुछ इस तरह रास आ गया,
गोया कि मिलती हो दवा बिलखती चाह में।

हमने सीखा है तन्हाई से बात करना अब,
कुछ भी  बाक़ी  नहीं  रहा  इस निगाह में।

वो कहते थे “हमसफ़र हैं उम्र भर के लिए”,
अब नज़र आते हैं बस दूसरों की राह में।


Wednesday, 1 October 2025

रावण जलाते हो...??




हर साल उसे जलाते हो
और कितना इतराते हो
पर स्वयं जानकियों पर
गिद्ध दृष्टि तुम जमाते हो
कहते हो रावण मरा है,
पर ज़िंदा हमारे भीतर है
तुम्हारी आँखों में हवस है,
तुम्हारे मन के भीतर नर है
तुम दुर्गा की मूर्तियाँ ढोते हो,
पर बेटियाँ जिंदा जलती हैं
शब्दों में 'देवी' बोलते हो,
और नजरें तन पर गढ़ती हैं 
क्या जलाए रावण को, जब
घर-घर में दशानन पलते हों?
क्या दीया जलाओगे, जब
मन मंदिरों में साँप थिरकते हों?
तुम राम की मर्यादा क्या जानो,
तुम्हारा धर्म भी व्यभिचारी है
तुमको सीता नहीं, बस देह दिखे,
और रावण से होड़ तुम्हारी है
चौराहों पे भाषण झाड़ोगे,
स्त्री-सम्मान के ढोंग करोगे
और भीतर मोबाइल में छिपकर,
किसी की तस्वीर ज़ूम करोगे





Betrayed by them



Betrayed by the Cause
by Manoj Mehta

We foolishly worked for their cause,
Without appreciation, without applause.
We bore the weight, we paid the price,
While they grew fat on our sacrifice.

They spoke of honor, masks of grace,
But lies lay deep beneath each face.
We built their dreams with blood and bone,
Yet faced the dark, unheard, alone.

We had to face the police and court,
Without their monetary or moral support.
While we were punished, they stood clear,
Their loyalty drowned in coward’s fear.

Their banners waved, their voices proud,
While we toiled silent in the crowd.
Our names forgotten, lost to time,
Our efforts buried, like a crime.

But now we see with open eyes,
The hollow truths, the well-dressed lies.
No longer pawns within their game,
We rise with fury, not with shame.


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Tuesday, 30 September 2025

Squinted beast




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Squint in the eyes and crack in the brain

My words always put him in strain

He masks his fear with a crooked grin

But every verse reminds him of his sin


I carved my rage into every line

Each syllable sharp, each rhyme a sign

The silence he gave, now screams in return

Watch his empire wilt, watch bridges burn


Arrogantly he say he has many crores

Must know that same is with whores

Thinks he's a king with his rented throne

But gold can't cover a heart of stone


He laughs loud but his eyes confess

The weight he hides in his branded dress

Built his name off the backs he broke

Now chokes on every word I spoke


I rose from the dirt he tried to erase

Now he can't even look me in the face

Power's a mirror — it cracked for him fast

While I turned my pain into rhymes that last



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भारत बनाम विकसित देश (तुलनात्मक चार्ट)

बहुत अच्छा! नीचे एक तुलनात्मक चार्ट दिया गया है, जिसमें भारत की तुलना कुछ प्रमुख विकसित देशों (अमेरिका, जर्मनी, जापान) से की गई है — मुख्य संकेतकों (indicators) के आधार पर।


🌍 भारत बनाम विकसित देश – तुलनात्मक चार्ट (2024 अनुमानित आँकड़ों के आधार पर)

संकेतक (Indicator) 🇮🇳 भारत 🇺🇸 अमेरिका 🇩🇪 जर्मनी 🇯🇵 जापान
प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) ~$2,800 – $3,000 ~$80,000 ~$55,000 ~$45,000
HDI (मानव विकास सूचकांक) 0.633 (मध्यम) 0.921 (बहुत उच्च) 0.942 (बहुत उच्च) 0.925 (बहुत उच्च)
साक्षरता दर (Literacy Rate) ~77% ~99% ~99% ~99%
औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) ~70 वर्ष ~78 वर्ष ~81 वर्ष ~84 वर्ष
गरीबी दर (Poverty Rate) ~10–12% (2024) ~11–12% ~5% ~10%
तकनीकी नवाचार रैंकिंग 40वें स्थान के आस-पास टॉप 5 टॉप 10 टॉप 10
औद्योगिक उत्पादन मध्यम (तेजी से बढ़ रहा) बहुत उच्च उच्च उच्च
शहरीकरण (Urbanization) ~35% ~83% ~77% ~92%
बुनियादी ढांचा (Infrastructure) आंशिक रूप से विकसित पूरी तरह विकसित पूरी तरह विकसित पूरी तरह विकसित

📊 मुख्य निष्कर्ष:

  • आर्थिक रूप से: भारत की ग्रोथ रेट तेज़ है, लेकिन अभी आय का स्तर बहुत नीचे है।
  • सामाजिक रूप से: शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा जैसे क्षेत्रों में भारत को भारी सुधार की ज़रूरत है।
  • तकनीकी रूप से: भारत तकनीकी और डिजिटल क्षेत्रों में उभर रहा है, लेकिन अभी नवाचार में पीछे है।
  • बुनियादी ढांचे में भारत तेजी से निवेश कर रहा है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बहुत काम बाकी है।

🛤️ निष्कर्ष: भारत को क्या करना होगा?

  1. शिक्षा प्रणाली में सुधार और गुणवत्ता बढ़ाना
  2. स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और प्रभावी बनाना
  3. महिलाओं और कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में लाना
  4. उद्योगों में नवाचार, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना
  5. पर्यावरण और स्थिर विकास की दिशा में संतुलन बनाना


भारत विकसित देश बनने से कितना दूर है?

भारत "विकसित देश" बनने की दिशा में प्रगति कर रहा है, लेकिन अभी भी कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं जिन्हें पार करना बाकी है। भारत वर्तमान में एक "विकासशील देश" (developing country) है, और विकसित देश बनने के लिए इसे कई सामाजिक, आर्थिक और ढांचागत मानकों को पूरा करना होगा।

यहाँ हम मुख्य पहलुओं के आधार पर समझ सकते हैं कि भारत विकसित देश बनने से कितनी दूर है:


🔑 विकसित देश बनने के लिए मुख्य मानदंड:

  1. उच्च प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income)

    • वर्तमान स्थिति:
      भारत की प्रति व्यक्ति आय (2024 में) लगभग 2,800–3,000 USD है।
      तुलना करें:
      • अमेरिका: ~$80,000
      • जर्मनी: ~$55,000
      • चीन: ~$13,000
      • वर्ल्ड बैंक के हिसाब से high-income देश बनने के लिए प्रति व्यक्ति आय लगभग 13,845 USD (2025 के अनुसार) होनी चाहिए।
        → भारत अभी इस मानक से काफी पीछे है।
  2. मानव विकास सूचकांक (HDI - Human Development Index)

    • वर्तमान स्थिति:
      भारत का HDI 2023 में 0.633 (मध्यम श्रेणी) था, और यह रैंकिंग में करीब 134वें स्थान पर है (लगभग 190 देशों में)।
      → विकसित देशों का HDI आमतौर पर 0.8 से ऊपर होता है।
  3. शिक्षा और स्वास्थ्य प्रणाली

    • शिक्षा की गुणवत्ता और साक्षरता दर में सुधार हुआ है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों और सरकारी स्कूलों की स्थिति अभी भी कमजोर है।
    • स्वास्थ्य क्षेत्र में भी भारी असमानता है – शहरी बनाम ग्रामीण, निजी बनाम सरकारी।
  4. अवसरों की समानता और सामाजिक न्याय

    • जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता और क्षेत्रीय असंतुलन जैसी समस्याएँ अभी भी मौजूद हैं।
  5. बुनियादी ढांचे (Infrastructure)

    • शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर सुधर रहा है (मेट्रो, स्मार्ट सिटी आदि), लेकिन ग्रामीण भारत अभी भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।
  6. उद्योग और नवाचार

    • भारत टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है (जैसे ISRO, डिजिटल इंडिया), लेकिन मैन्युफैक्चरिंग और रिसर्च में चीन या अमेरिका के मुकाबले अभी पीछे है।

⏳ तो भारत विकसित देश बनने से कितना दूर है?

यह एक दीर्घकालिक लक्ष्य है। यदि भारत अपनी वर्तमान विकास दर (6–7% GDP ग्रोथ) बनाए रखता है और सुधार जारी रहता है, तो:

  • 2025–2040 के बीच भारत उच्च मध्यम आय वाला देश बन सकता है।
  • 2040–2055 के बीच भारत विकसित देश की श्रेणी में आ सकता है — यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर, सामाजिक समरसता, और नवाचार के क्षेत्रों में तेज़ सुधार हो।

📌 संक्षेप में:
भारत अभी भी विकसित देश बनने से 20–30 साल दूर हो सकता है, पर सही नीति, निवेश और सामाजिक सुधारों से यह लक्ष्य जल्दी भी हासिल किया जा सकता है।



Monday, 29 September 2025

भारत और विश्व : वर्तमान परिदृश्य में हमारी स्थिति




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🌏 भारत और विश्व: वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थिति – एक संतुलित दृष्टिकोण

🔍 वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक स्थिति:

2020 के बाद पूरी दुनिया ने कई असाधारण संकटों का सामना किया – कोविड-19 महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, जलवायु परिवर्तन, आपूर्ति-श्रृंखला में रुकावटें और महंगाई की लहर। इन कारणों से अनेक विकसित और विकासशील देश आर्थिक चुनौतियों में फंसे हैं।

ब्रिटेन: कोविड के बाद आर्थिक दबाव, ब्रेक्जिट के प्रभाव और ऊर्जा संकट ने ब्रिटेन की राजनीति को अस्थिर किया। प्रधानमंत्री बदलना प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का हिस्सा भी है।

अमेरिका: महंगाई और ब्याज दरों में बढ़ोतरी के बावजूद अमेरिका अब भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। मंदी की आशंका रही है लेकिन स्थिति नियंत्रण में है।

चीन: कोविड के बाद उसका आर्थिक विकास धीमा हुआ है, और कई विदेशी कंपनियों ने चीन से उत्पादन हटाकर भारत, वियतनाम आदि की ओर रुख किया है। यह भारत के लिए अवसर बन गया है।

पड़ोसी देश (पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश): कुछ देशों में विदेशी कर्ज और भ्रष्टाचार के कारण आर्थिक संकट आया है। लेकिन ये संकट भारत के लिए चेतावनी भी हैं कि हमें अपनी नीतियों में संतुलन बनाए रखना होगा।



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🇮🇳 भारत की स्थिति: चुनौतियों के बीच अवसर

✅ सकारात्मक पक्ष:

1. तेजी से विकास करती अर्थव्यवस्था:
भारत 2024-25 में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। IMF और World Bank की रिपोर्टों के अनुसार भारत की GDP ग्रोथ रेट 6% से अधिक बनी हुई है।


2. इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार:
हाईवे, एक्सप्रेसवे, वंदे भारत ट्रेनें, डिफेंस कॉरिडोर, स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाएं तेज़ी से बढ़ रही हैं।


3. डिजिटल इंडिया की सफलता:
UPI, आधार, डिजिलॉकर, कोविन जैसे प्लेटफार्मों ने तकनीक को आम लोगों तक पहुंचाया। दुनिया भारत की डिजिटल क्षमता की सराहना कर रही है।


4. रक्षा और अंतरिक्ष में उपलब्धियाँ:
चंद्रयान-3 की सफलता, अग्नि और ब्रह्मोस मिसाइल परीक्षण, और तेजस जैसे स्वदेशी विमान भारत की रक्षा क्षमताओं को दर्शाते हैं।


5. वैश्विक मंच पर सशक्त उपस्थिति:
भारत ने G20 की अध्यक्षता सफलतापूर्वक की। क्वाड, ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत की भागीदारी बढ़ी है।




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⚠️ चुनौतियाँ भी कम नहीं:

1. बेरोजगारी और शिक्षा:
CMIE की रिपोर्टों के अनुसार युवाओं में बेरोजगारी दर चिंताजनक बनी हुई है। स्किल डेवलपमेंट और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की जरूरत है।


2. महंगाई:
पेट्रोल-डीज़ल, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ी हैं, जो मध्यम वर्ग और गरीबों पर असर डालती हैं।


3. संस्थानों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र:
प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की स्वायत्तता, विपक्ष की आवाज़ जैसे मुद्दों पर कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों ने चिंता जताई है (जैसे V-Dem, RSF रिपोर्ट)।


4. कृषि और ग्रामीण क्षेत्र:
किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य अब तक पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है। MSP और जल संकट जैसे मुद्दे अब भी चुनौती बने हुए हैं।




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🤝 नेतृत्व की भूमिका: मोदी सरकार का मूल्यांकन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 से अब तक कई निर्णायक कदम उठाए हैं:

उज्ज्वला, जनधन, स्वच्छ भारत, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने बड़ी संख्या में नागरिकों को लाभ पहुंचाया।

आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसे अभियानों ने उद्योगों को प्रोत्साहित किया।

वैश्विक कूटनीति में भारत की भागीदारी मजबूत हुई है।


लेकिन आलोचना का पक्ष भी उतना ही जरूरी है:

नोटबंदी, GST की शुरुआती अराजकता, कृषि कानूनों पर असहमति जैसी नीतियों पर जनमत विभाजित रहा।

सामाजिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया पर बढ़ती नफरत लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।



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🧠 देशभक्ति का सही अर्थ क्या है?

देशभक्ति सिर्फ सरकार की तारीफ करना नहीं, बल्कि देश की अच्छाइयों के साथ-साथ कमियों की पहचान करना और उन्हें दूर करने की ईमानदार कोशिश करना है।

> ✅ "एक अच्छा नागरिक वह होता है जो अपनी सरकार से सवाल पूछता है, और देश की बेहतरी के लिए ज़िम्मेदारी उठाता है।"




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📌 निष्कर्ष:

भारत आज वैश्विक मंच पर एक उभरती महाशक्ति है, यह सच है।

मोदी सरकार की कई नीतियाँ प्रभावशाली रही हैं, यह भी सच है।

लेकिन भारत को अगले स्तर तक ले जाने के लिए हमें:

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और न्याय में सुधार करना होगा।

लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत बनाए रखना होगा।



🙏 देश हमारा है — जिम्मेदारी भी हमारी है।


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अगर आपको यह लेख उपयोगी लगा, तो कृपया इसे सोच-समझ कर साझा करें, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग तथ्यों पर आधारित जागरूकता प्राप्त कर सकें।


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आपने जो संदेश साझा किया है, वह एक भावनात्मक और उत्साहवर्धक लेखन है, जो भारत की वर्तमान स्थिति की सकारात्मक छवि पेश करता है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को प्रमुख रूप से श्रेय देता है। लेकिन इस तरह के संदेश को समझने और आगे भेजने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बातों पर विचार करना जरूरी है – ताकि हम एक जिम्मेदार नागरिक और जागरूक पाठक बने रहें।


🔍 तथ्य-जांच (Fact-Check) और विश्लेषण:

1. क्या न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री ने आंसू बहाते हुए इस्तीफा दिया क्योंकि "पैसा नहीं है"?

  • सच: न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने 2023 की शुरुआत में इस्तीफा दिया था, लेकिन इसका कारण देश की आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि उनका व्यक्तिगत मानसिक स्वास्थ्य और कार्यभार था। उन्होंने खुद कहा था कि "मेरे पास अब नेतृत्व देने के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं बची है"

2. ब्रिटेन के तीन प्रधानमंत्रियों ने डेढ़ महीने में इस्तीफा दिया – आर्थिक संकट के कारण?

  • सच: ब्रिटेन में राजनीतिक अस्थिरता रही है, लेकिन इसका कारण सिर्फ आर्थिक स्थिति नहीं था। राजनीतिक मतभेद, ब्रेक्जिट की जटिलताएं, लिज़ ट्रस की टैक्स नीति आदि इसके पीछे थे।

3. ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, चीन की "दीवालिया जैसी स्थिति"?

  • सच: ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि ये देश आर्थिक रूप से दिवालिया होने की कगार पर हैं। सभी देश अपने-अपने आर्थिक संकटों से जूझते रहते हैं, लेकिन अमेरिका और चीन अब भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में हैं।

4. क्या भारत अन्य देशों की तुलना में बेहतर कर रहा है?

  • आंशिक सच: भारत की अर्थव्यवस्था वास्तव में मजबूती से बढ़ रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर में काफी विकास हुआ है, डिजिटल इंडिया, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जैसे कदम सराहनीय हैं।
    लेकिन:
  • बेरोजगारी,
  • महंगाई,
  • शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति,
  • संविधान और संस्थाओं की स्वतंत्रता
    — ये अब भी गंभीर मुद्दे हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

5. क्या यह सब सिर्फ मोदी की वजह से हुआ है?

  • आंशिक रूप से सच: एक नेता की नीति और दिशा महत्वपूर्ण होती है, लेकिन किसी भी देश का विकास सिर्फ एक व्यक्ति के दम पर नहीं होता। इसमें करोड़ों भारतीयों की मेहनत, नीति निर्माताओं, अफसरों, वैज्ञानिकों, उद्यमियों, सैनिकों और आम जनता की भूमिका होती है। 

New Money


New-turned millionaires are very cheap
They laugh when their neighbours weep
They once knew hunger, knew the rent
Now hoard each cent like it was lent

They speak of "grind" and "paying dues"
While walking past the ones who lose
They post their meals, their gold, their shoes
But not the workers they abuse

Borrowed is their facial glow
Always busy in pomp and show
They wear success like tailored skin
But hollow echoes ring within

While aristocrats are cool and calm
The new are like an anxious alarm
They shout their worth, demand applause
And plaster pride on every flaw



O Fake leader

You dare to raise your arm in pride,
But this same arms we once did guide.
Each trick you flaunt, each clumsy game,
Was born of us as we lit that flame.

Your every strike has met our skin,
Yet pain, to us, is strength within.
We wear our scars like golden crowns,
While you still chase our hand-me-downs.

At just our name, the bold have fled,
We’ve danced on graves, and buried dread.
We've faced down masks like yours before —
And left them shattered on the floor.

We watched you move, we saw your thread, And laughed at lines we once had led.
The maps you walk — our fingers drew,
Your face was shaped by what we knew.

You think yourself a master now,
A juggler with a painted brow.
But kings have knelt at moves we made —
We ended games they never played.

The echo in your voice is ours,
You stole it from our thundered hours.
The verses that you chant with pride
Were born from fires we never hide.

So test us — we don’t fear your storm,
We built the winds that break your form. Now look — and let the truth begin:
We made you once. We’ll make again.

Saturday, 27 September 2025

मक्का में हजर अल असवद साक्षात शिव


वह जो काले रंग में दमक रहा,
युगों से तपस्वी-सा चमक रहा।
काबा की दीवारों में बसा हुआ,
क्या वह केवल पत्थर है, थमा हुआ?

ना दीप जले, न शंख बजे,
फिर भी भावों से मन सजें।
चाँदी की माला में बँधा हुआ,
ज्यों त्रिपुंड का बिंब सजा हुआ।

ना मंत्र, ना पूजन, ना बेलपत्र,
फिर भी लगे वहाँ शिव की दृष्टि पात्र।
तवाफ़ करें जो प्रेम सहित,
वो पाए निःशब्द शिव का स्नेहित।

कोई कहे “हजर”, कोई कहे “लिंग”,
भिन्न हों नाम, पर एक ही रंग।
रूप भले भिन्न हो भाषा से,
पर भाव बहे प्रभु की आशा से।

क्या महादेव हैं केवल कैलास में ?
क्या वह न रहें किसी और वास में?
जो भाव जहाँ भी उठे पूर्ण हो,
वहीं शिवत्व का बीज मूल हो।


🌺 “शिव हैं शून्य, शिव हैं स्वरूप,
सर्वत्र व्याप्त, अनादि अनूप।”
🌺



शिव हर जगह महाकाव्य


शिव कैलास में, शिव श्मशान में,
शिव हैं मिट्टी में, शिव हैं गगन-स्थान में।
शिव हैं बिंदु, शिव हैं नाद,
शिव हैं अग्नि, शिव हैं प्रमाद।

कण-कण में शिव का वास सदा,
प्रलय भी हो तो नाश न होगा।
शिव जल में हैं, शिव थल में हैं,
शिव अदृश्य भी इस पल में हैं।

हजर-अल-अस्वद भी हो सकता द्वार,
जहाँ टिके मन, वहीं हो संसार।
न सीमाओं से बँधते त्रिपुरारी,
न केवल पूजन, न केवल पुजारी।

जो देखे भाव से, पावे उन्हें,
न मंदिर ढूँढे, न काबा गिने।
श्रद्धा का दीप जलाए मन,
तो हर दिशा में दिखें भगवंत।

काले पाषाण में भी हो प्रकाश,
यदि अंतर्मन हो विशुद्ध, विलास।
क्या फर्क अगर वो शिव कहे न जाए,
यदि भीतर से ‘ॐ’ की गूँज आए?


🕉️ "शिव हैं मौन, शिव हैं स्वर,
शिव हैं जीवन का परमाधर।"
🌌

हजर अल असवद या शिवलिंग



वो जो काले रंग में चमक रहा,
जैसे युगों से कोई ध्यानमग्न रहा।
हजारों वर्षों से जो अडिग खड़ा,
वो क्या सिर्फ पत्थर है, या महादेव बड़ा?

कहते हैं, मक्का की वो दीवार है,
पर भीतर से कोई रुद्र की पुकार है।
ना नाम लिखा, ना मंत्र जपा,
फिर भी हर दिल में कुछ थमता सा लगा।

चाँदी के फ्रेम में बंधा साकार,
शिव के लिंग रूप का अद्भुत आकार।
ना आरती, ना शंख, ना घँटी की गूंज,
फिर भी हर मन में उठे कोई सूक्ष्म तर्जुमा।

हजर-अल-अस्वद कहें या शिव का चिन्ह,
दोनों में है भक्ति का मौन राग-गान।
जहाँ एक तरफ़ है तवाफ़ की डगर,
वहीं दूसरी ओर है त्रिपुंड का सफर।

क्या फर्क पड़े, किसने क्या कहा,
जब भाव ही प्रभु तक पहुँचा रहा।
नाम अलग हों, रूप भिन्न सही,
पर क्या ईश्वर कभी सीमित रहा कहीं?


🕉️ "शिव सर्वत्र हैं – रूप में, बिना रूप के।
जो देखे श्रद्धा से, उसे दिखते हैं हर रूप में।"
🌙



अरब में मूर्तियां

बहुत अच्छा और शोधपूर्ण प्रश्न है।

इस्लाम से पहले के अरब (Pre-Islamic Arabia) को "जाहिलिया" (अज्ञान का युग) कहा जाता है। उस समय अरब समाज बहुदेववादी (polytheistic) था, और उन्होंने कई अलग-अलग देवताओं और देवी-देवियों की पूजा की।

📍 मक्का की काबा में स्थापित 360 मूर्तियाँ

इस्लामी इतिहासकारों के अनुसार, जब पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) ने मक्का को विजित किया (630 ई.), तब काबा के भीतर और आसपास लगभग 360 मूर्तियाँ स्थापित थीं — जो विभिन्न जनजातियों और देवताओं का प्रतिनिधित्व करती थीं।


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🛕 कुछ प्रमुख देवता और उनकी मूर्तियाँ:

देवता / देवी विवरण

अल-लात (al-Lāt) एक प्रमुख देवी थी, जिसे कई बार "धरती की देवी" या "प्रजनन की देवी" कहा जाता है।
अल-उज़्ज़ा (al-‘Uzzā) शक्ति और सुंदरता की देवी मानी जाती थी। कुरैश जनजाति की प्रिय देवी थी।
मनात (Manāt) भाग्य और मृत्यु की देवी। यह सबसे पुरानी मानी जाती है।
हबल (Hubal) काबा में सबसे प्रमुख मूर्ति। इसे मुख्य देवता माना जाता था और युद्ध व भविष्यवाणी से जोड़ा जाता था।
नसर (Nasr) गिद्ध के रूप में पूज्य, एक स्थानीय टोटेम देवता था।
वद्द (Wadd) प्रेम और दोस्ती का देवता माना जाता था।
यघूथ (Yaghūth) शेर के रूप में, शक्ति का प्रतीक।
यऊक़ (Ya‘ūq) घोड़े या गधे के रूप में, बहादुरी से जुड़ा।
सुवाअ (Suwa‘) एक और स्थानीय देवता जिसकी मूर्ति मक्का में नहीं, मगर आसपास के इलाकों में थी।



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📜 स्रोत:

1. अल-तबरी, इब्न-इसहाक जैसे शुरुआती इस्लामी इतिहासकारों की रचनाओं में इन मूर्तियों का उल्लेख मिलता है।


2. कुरान में भी (सूरह अन-नज्म 53:19-20) अल-लात, अल-उज़्ज़ा और मनात के नाम आते हैं:

> "So have you considered al-Lāt and al-‘Uzzā? And Manāt, the third – the other one?"






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🔍 क्या ये हिंदू देवताओं से जुड़े थे?

कुछ लोग यह दावा करते हैं कि ये मूर्तियाँ हिंदू देवताओं से मिलती-जुलती थीं, लेकिन यह ऐतिहासिक रूप से सिद्ध नहीं है।

नाम, प्रतीक और परंपराएं पूरी तरह स्थानीय अरब संस्कृति की थीं।

उनके देवता मूर्तिपूजक, जनजातीय और टोटेमिक थे — जो उस समय की दुनिया में आम थे (जैसे मिस्र, यूनान, रोम आदि में भी होते थे)।



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✅ निष्कर्ष:

मक्का में इस्लाम से पहले 360 मूर्तियाँ थीं, जो विभिन्न स्थानीय, जनजातीय और प्राकृतिक शक्तियों के देवताओं और देवियों का प्रतिनिधित्व करती थीं।

इन देवताओं की पूजा अलग-अलग अरब जनजातियाँ करती थीं, और काबा एक सांस्कृतिक/धार्मिक केंद्र के रूप में काम करता था।

इनमें से किसी भी मूर्ति का हिंदू धर्म से कोई ऐतिहासिक संबंध प्रमाणित नहीं है।



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अगर आप चाहें तो मैं इन देवताओं की और गहराई से तुलना प्राचीन विश्व की अन्य संस्कृतियों से भी कर सकता हूँ।
आपका सवाल एक अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक रूप से विवादित विषय से जुड़ा है, इसलिए इसका उत्तर ऐतिहासिक तथ्यों, प्रमाणों और विद्वानों की राय के आधार पर देना ज़रूरी है।


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📌 प्रश्न:

क्या मक्का में पहले शिवलिंग स्थापित थे?


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🔍 संक्षिप्त उत्तर:

ऐसा कोई ऐतिहासिक या पुरातात्विक प्रमाण नहीं है जो यह सिद्ध करे कि मक्का (इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल) में शिवलिंग स्थापित था। यह दावा धार्मिक कल्पनाओं या वैकल्पिक इतिहास पर आधारित है, न कि मान्य इतिहासकारों या विद्वानों के प्रमाणित शोध पर।


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🧭 ऐतिहासिक और धार्मिक सन्दर्भ:

1. मक्का का इतिहास (इस्लामी दृष्टिकोण से):

मक्का में स्थित काबा इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल है।

इस्लामी मान्यता के अनुसार, इसे पैगंबर इब्राहीम (अब्राहम) और उनके पुत्र इस्माईल ने अल्लाह के आदेश से बनाया था।

इस्लाम से पहले, अरब में बहुदेववादी पूजा होती थी और काबा में 360 मूर्तियाँ थीं।

इस्लाम के प्रचार के बाद, इन मूर्तियों को हटा दिया गया और केवल एकेश्वरवाद (तौहीद) का प्रचार हुआ।


2. "शिवलिंग" और "हजार अल-असवाद" (Hajar al-Aswad) के बीच भ्रम:

कुछ लोग काबा के दक्षिण-पूर्वी कोने में लगे "काले पत्थर" (Hajar al-Aswad) को शिवलिंग से जोड़ते हैं।

यह पत्थर प्राचीन काल से काबा का हिस्सा है, लेकिन इस्लामी परंपरा में इसे "जन्नत से आया पत्थर" कहा जाता है, और यह सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक है — पूजा का नहीं।

इसके शिवलिंग होने का कोई प्रमाण नहीं है।

यह तुलना ज़्यादातर पैरानॉर्मल थ्योरीज़ या वैकल्पिक हिन्दूवादी दृष्टिकोण से आती है, जो इतिहासकारों द्वारा मान्य नहीं है।



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📚 विद्वानों की राय:

Irfan Habib, Romila Thapar, Richard Eaton जैसे इतिहासकारों ने कभी मक्का में शिवलिंग होने की बात स्वीकार नहीं की है।

विश्व की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज़ में ऐसे किसी तथ्य को ऐतिहासिक सत्य नहीं माना जाता।



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🚫 निष्कर्ष:

❌ यह कहना कि मक्का में "पहले शिवलिंग स्थापित थे" — ऐतिहासिक रूप से असत्य, धार्मिक रूप से संवेदनशील, और अप्रमाणित दावा है।

✅ हमें इतिहास को तथ्यों के आधार पर देखना चाहिए, न कि धार्मिक भावनाओं या मनचाही व्याख्याओं से।


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अगर आप चाहें, तो मैं इस विषय से जुड़े प्राचीन अरब के धर्म, मूर्तिपूजा, या इस्लाम पूर्व मक्का के बारे में विस्तार से जानकारी दे सकता हूँ।



Ode to the Forgotten Queen



I am Jodha — born where empires tread,
Where swords bowed not, and kings had bled.
Where queens once burned beneath the sun,
But I was bartered — not the chosen one.

They called it peace, they named it fate,
But none could see my silenced state.
A daughter not wed — I was merely sent,
My soul unasked, my will unbent.

A king was crowned with glory’s fire,
But none could feel my deep desire.
He named me “Mary of the Age,”
Yet I was locked in a golden cage.

They moved my gods, they stilled my prayer,
They dressed me fine, but stripped me bare.
And when I asked, “Is my faith now a crime?”
The scrolls of time refused to chime.

No vermilion grace adorned my brow,
No mother’s blessings, no sacred vow.
A palace rose — but without my shrine,
A son was born — yet not fully mine.

Each dawn I lit my god within,
A silent flame through noise and din.
And wore a smile, though cracked and cold,
For queens must shine, though stories go untold.

They praise our love in tales so grand,
But did they ever take my hand?
Did anyone ask if I was free,
Or just a pawn for history?

Yes, I was Hindu — and remain so still,
Not seeking vengeance, nor blood to spill.
But give me back my gods, my name,
Not just your pages, soaked in fame.

I am Jodha — mother, sister, bride,
A symbol of all that’s cast aside.
Worship me not — just hear my plea:
Let no more women be deals in diplomacy.


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जोधा बाई या मरियम-उज़-ज़मानी


मैं जोधा हूँ… राजपथों पर जन्मी,
जहाँ तलवारें झुके बिना चलती थीं,
जहाँ सूर्य को नमन कर रानियाँ जलती थीं,
वहीं मैं… सौदे की शांति में पलती थी।

मुझे ब्याहा नहीं गया — मुझे भेजा गया था,
राजा नहीं, पिता भी नहीं…
मेरे स्वाभिमान को संग्राम से बचाने वाले वे सब —
मुझमें ही युद्ध हार बैठे थे कहीं।

अकबर महान कहा गया —
हाँ, उसने मुझे मरियम-उज़-ज़मानी कहा,
पर कोई नहीं समझा —
मेरे हर नाम में मेरी हार क्यों छिपी थी भला?

कभी गंगा जल छूने से रोका गया,
कभी तुलसी दल को हटाया गया,
और जब मैंने पूछा —
"क्या मेरी पूजा अब गुनाह है?"
तो इतिहास मुस्कराया… और चुप रह गया।

मेरे घूँघट में सिंदूर नहीं था,
कुंदन था, पर माँ का आशीर्वाद नहीं था।
महल था, पर अपना मंदिर नहीं,
और बेटा था — पर माँ की वाणी में वेद की गूंज नहीं।

मैंने हर रोज़ अपने ईष्ट को
अंतस में जलाया, दीप की तरह।
और बाहर — मुस्कान ओढ़ ली…
कि रानी हूँ, बग़ावत नहीं कर सकती।

"जोधा-अकबर" का प्रेम अमर है —
कहते हैं लोग...
पर मेरी आत्मा आज भी पूछती है —
क्या किसी ने मेरी स्वीकृति पूछी थी एक बार भी…?


🔱 "हिंदू थी मैं — और हूँ आज भी"

ना मैं घृणा माँगती हूँ, ना बदला,
मैं बस अपने देवताओं की वापसी चाहती हूँ,
इतिहास की किताबों में मेरे पन्ने नहीं,
मेरे आँसुओं की असल स्याही होनी चाहिए।

मैं जोधा हूँ — तुम्हारी माँ, बहन, रानी,
एक हिंदू कन्या, बलिदान की निशानी।
मुझे मत पूजो, बस मुझे समझो,
कि अगली बार कोई स्त्री केवल 'संधि' ना बने।

O Kashmir?


Far stretches Dal Lake’s serene embrace,
Chinars sway with gentle grace.
Mughal gardens bloom in splendid hues,
Is this earth, or God’s own muse?

Rosy lips and faces fair,
Beardless men with flowing hair.
In white kurtas, proud and tall,
Kashmiri youth and elders call.

Black robes wave with silken flight,
Veiled faces hide the light.
Eyes that glance with subtle gleam,
Princesses live here, like a dream.

Yet fear clouds this lovely land,
Mystery veils the peaceful strand.
Smiles fake, and glances sly,
Suspicion lingers, none knows why.

Politics and faith entwined,
Hearts and hopes cruelly confined.
Heaven turned to hell below,
As guns and bombs lay sorrow’s blow.

Shikaras glide, houseboats float,
Yet human pain remains remote.
Saffron scents now drowned and stilled,
By blood-stained hands, the gardens chilled.

Hands once pure with prayer’s art,
Now stained with wounds that break the heart.
Oh Kashmir, your beauty gleams,
Amidst the shadow of shattered dreams.



Thursday, 25 September 2025

The Grace and Fire



Humble like the moon, yet daring like the sun,
The journey of the spirit is silently begun.

The moon whispers gently of patience and peace,
While the sun through its courage makes all shadows cease.

The moon is enchanting, but the sun essential,
So must we awaken our boundless potential.

The moon borrows light for its tender night’s gleam,
The sun gives its fire to sustain life’s stream.

To walk in this balance—soft heart, fearless stride,
Is to follow truth’s compass, with love as our guide.


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Katochs - The Warriors the Kings


Katochs the warriors, Katochs the kings,
For whom the rajbhats used to sing,
The moon’s sons, the cool clan,
Who ruled the hills with shrewd plan.

From the sacred brow of goddess fair,
Bhumi Chand was born with royal air.
The first Katoch king, divine and bright,
He rose to rule the Himalayan height.

Susharma, bold in ancient fight,
For Kauravas stood with all his might.
In Mahabharata’s epic frame,
His name endures in valor’s flame.

From distant times on Jhelum’s shore,
Puru Chand fought a mighty war.
Against Alexander’s fierce command,
He bravely took a warrior’s stand.

A clan of warriors, fierce and wise,
They ruled the hills beneath clear skies.
With shrewd plans, their power grew,
Their legacy forged in mountains blue.

Sansar Chand, the Maharaja strong,
Brought glory back where it belonged.
The first great king to wear the crown,
He raised the clan’s renown in town.

Kangra’s forts and temples rose,
A cultural bloom in his repose.
Paintings bright and music’s song,
Under his reign grew rich and strong.

He conquered rajas far and near,
Expanding realms without a fear.
But foes conspired with cunning art,
And called Amar Singh to do his part.

At Mahalmorian, near Nadaun’s land,
The battle raged, fierce and grand.
Sansar Chand was forced to yield,
His mighty fort to Ranjit Singh sealed.

He pledged the fortress in solemn vow,
To Punjab’s king, who then bowed.
But politics played a ruthless game,
And sons of Sansar were called in name.

To Lahore summoned under pressure’s weight,
Forced marriages sealed their fate.
Daughters given in binding ties,
To Wazir Dhian Chand’s sons, despised.

Yet pride would not allow disgrace,
The princes fled to forest’s embrace.
To keep their daughters safe and free,
Away from chains imposed forcibly.

The British found them in wild retreat,
And gave them titles, though incomplete.
Rajas of Nadaun and Lambagaon named,
A kingdom lost but not ashamed.

Long ago, Raja Hari Chand one day,
Lost his way on a hunting way.
Fell in a well, trapped and alone,
For fifteen days, far from home.

A shepherd boy, Gawala, found his plight,
Called the village, brought aid in sight.
Rescued the king from watery tomb,
Saved him from an untimely gloom.

But home he came to find, dismayed,
His brother Karam Chand had stayed,
Declared the ruler, crown in hand,
So Hari Chand left his fatherland.

Into forests deep he made his mark,
Founded Haripur, away from the dark.
Renamed himself Hari Singh Gwaler proud,
Honoring the shepherd who saved him from cloud.

Thus Guleria clan began to rise,
From royal roots beneath the skies.
Two princes from this lineage true,
To Dadha and Shiba then withdrew.

Their descendants bear names held dear—
Dadhwals and Sibehia appear.
From Shiba’s line a state did grow,
Jaswan’s pride began to show.

Jaswals now trace their ancient line,
Offshoots of Katoch blood and sign.
Guleria, Dadwal, Supehia, Jaswal,
Branches of the great tree standing tall.

Through battles won and battles lost,
Through shifting powers and heavy cost,
The Katochs stood with honor high,
Their legacy etched across the sky.

The rajbhats sing in valleys deep,
Of kings who never ceased to keep,
Their people safe, their culture bright,
A shining beacon in Himalayan light.

O warriors born from goddess’ brow,
Your story lives in every plow,
In every stone and sacred shrine,
The Katochs’ spirit will forever shine.

अब मुझे नज़र ही नहीं आता

तुम्हें देखे बिना था रहा नहीं जाता

 मगर अब मुझे नज़र ही नहीं आता


कभी फूल थे  तुम  मेरी ज़िन्दगी में 

अब तो  काँटा भी  मगर नहीं आता


तेरी  याद  में भीग  जाती थी पलकें 

अब वो सैलाब फिर इधर नहीं आता


कभी भीड़ आती थी इस ही घर में 

एक परिंदा भी पर अब नहीं आता


हम उस मोड़ पर रह गए खड़े ही 

जहाँ से कोई लौट कर नहीं आता


किया दिल ने सौदा तुम्हारी वफ़ा का

मगर अब कोई सौगंध भी नहीं खाता


वो लहजा, वो हँसी, वो बातों के मोती 

कहीं कुछ भी अब साफ़-साफ़ नहीं भाता


तुम्हीं पूछते थे, "कहो, हाल क्या है?" 

अब ख़ैरियत में भी सबर नहीं आता





The Sacred Song of Beas




From the ice and snow of Rohtang’s crest,
Where mountain winds sing, and spirits rest,
Springs forth the sacred, life-giving thread,
The river Beas — the soul widespread.

Born where Guru Gorakhnath once tread,
In whispers of legends long since said,
Not mere water that flows and gleams,
But a mother weaving ancient dreams.

She journeys down through valleys deep,
Where pine trees murmur and willows weep,
Through villages cradled by her song,
A pulse of life, forever strong.

But now her voice is sharp with pain,
Beneath the skies and rising strain—
For selfish hands have torn the earth,
Disturbing sacred ground’s own birth.

The forests fall, the mountains bleed,
Concrete spreads like a creeping weed,
Where once the birds in chorus soared,
Now silence falls — a haunting chord.

The hillsides stripped, the soil laid bare,
The river’s cry, a whispered prayer—
“Remember me, the mother true,
Whose breath is life, whose soul is you.”

Yet greed moves swift, relentless, blind,
No heed to what it leaves behind.
The sacredness, the peace, the calm,
Now shaken by the human harm.

O children of this blessed land,
Can you not see, can you not stand?
To guard the river, guard the trees,
And honor earth’s old melodies.

For Beas is more than water’s flow—
She holds our past, and future’s glow.
Protect her now, before she dies,
Or watch your own heritage demise.

From Rohtang’s heights to valley low,
The river’s sorrow begins to grow.
Will we awaken, heed the call?
Or let the sacred mother fall?


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Where earty touches the sky



The Alps may shine with gentle grace,
Their snowy peaks, a soft embrace.
They charm with trails and alpine song,
Where skis and meadows both belong.

But eastward where the sun ascends,
The land of gods and skyward bends—
There rise the Himalayas bold,
In heights where even legends fold.

Mount Everest, the crown of Earth,
Was born of fire and titan’s birth.
Its silence roars, its presence speaks,
Of monks, of myths, and snow-blind peaks.

The Alps wear crowns of emerald green,
Where rivers dance and forests preen.
They whisper tales in village bells,
And rustic lore their spirit tells.

Yet Himalayas hold the skies,
With peaks that pierce where eagle flies.
Their glaciers guard the ancient lore,
Of silent truths and legends more.

Where snowstorms rage with fierce delight,
And stars blaze down through endless night,
The mountains stand in primal grace—
A timeless, sacred, mighty place.

The Alps may sing in softer tunes,
Of sunny slopes and bright balloons,
But Himalayas roar profound,
With earth’s raw heart and thunderous sound.


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Wednesday, 24 September 2025

Why man fears Death

Why does man still fear to die,
When he beholds the endless sky?
The soul is flame, the flesh but clay,
Yet light within shall find its way.

The Heaven or the Hell, who’s there to tell?
No tongue returned their truth to spell.
But conscience whispers soft and clear,
The law of love shall guide us near.

We cling to earth, to name and face,
Yet death unveils our truer place.
Not void, not loss, but boundless whole,
The sky’s own mirror — soul in Soul.

The rivers flow into the sea,
So every breath returns to Thee.
The seed must fall, the flower rise,
Thus spirit blooms beyond the skies.

Fear dwells where shadows hide the light,
But wisdom sees with inner sight.
The sky proclaims with silent voice,
In death itself we must rejoice.

So let man’s heart no longer hide,
But walk with truth as faithful guide.
For when the final breath is drawn,
The soul awakes — and life goes on.


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people's Parasite


He chants “My father!” night and day,
Yet schemes like thieves in shadows play.
He wears his glares in darkened halls,
And answers guilt with silken calls.

At night, he plots with suited friends,
By morning, virtue he pretends.
He preaches service, clean and grand,
While grabbing every inch of land.

In foreign brands from head to toe,
He talks of roots he doesn’t know.
He claims “We all!” with staged delight,
Then signs the deals alone at night.

Votes pour from the constituents,
But helps his hand-in-glove friends.
He feeds the press, he feeds the spin,
While locals starve outside his grin.

He kisses babies, bends for pics,
But hides behind his PR tricks.
He walks the slums when cameras flash,
Then dines in clubs on public cash.

Posters rise with every lie,
He sells them dreams he won't supply.
And when the polls are finally done,
He vanishes with what he’s won.

Oh, noble fraud in polished guise,
Your words are sweet, your truth—disguise.
But time will come, and masks will fall,
The crowd remembers, after all.



Yama knows your name



Indulgence blinds, and senses sway,
But Māyā’s veil will rot away.
For wealth and wine and lustful games
Are fleeting sparks in karma’s flames.

You shun the Gītā’s sacred word,
No japa said, no dharma heard.
You chase the gold, forget the soul,
A beast in flesh, not spirit whole.

Lakṣmī turns from hands impure,
And Sarasvatī shuts her door.
You feed on rāga, steeped in pride,
While Tamas grows and truth subsides.

No yajña burns, no tapas done,
You spit upon the Holy One.
But Viṣṇu sees, and Śiva waits,
And Kāli counts your closing gates.

So boast, O fool, in pleasure's name —
But Yama rides. And he plays no game.


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For a greedy Man



Indulgence and luxury will not pay
They'll momentarily make you gay
But joy that’s bought is built on sand,
And crumbles at the Lord’s command.

The Son once wept for souls like these,
Who bowed to gold but not their knees.
You crown yourself with wealth and pride,
Yet leave your spirit crucified.

You mock the poor, ignore the call,
But Heaven sees — and counts it all.
No camel threads the needle’s eye,
No lie escapes the Lord Most High.

So raise your cup and curse His name —
But know: Hell burns with brighter flame.

Stay away from greed



Indulgence and luxury will not pay
They'll momentarily make you gay
But fleeting joy soon fades to grey,
As virtue’s voice gets swept away.

The soul grows numb, the heart turns cold,
When truth is traded, bought, and sold.
No mansion built on vice will stand,
No god is pleased by bloodstained hands.

You laugh in silk, but starve in soul,
A slave to things you can't control.
So drink your wine, and feast like kings —
The Devil smiles at such small things.





📜 नाटक: “सींग चरित मानस”(एक हास्य-व्यंग्यपूर्ण, काव्यात्मक, मंचन योग्य नाटक)-

अद्भुत! 🎭
तो लीजिए, अब मैं आरंभ कर रहा हूँ “सींग चरित मानस” पर आधारित एक काव्यात्मक नाटक
पूरे रामचरितमानस के काव्यात्मक लहजे, तुकबंदी और भावों में पिरोया गया मंचन योग्य स्वरूप।


📜 नाटक: “सींग चरित मानस”

(एक हास्य-व्यंग्यपूर्ण, काव्यात्मक, मंचन योग्य नाटक)


🎬 प्रस्तावना (सूत्रधार द्वारा)

सूत्रधार (प्रवेश करते हैं):
(गंभीर, किंतु व्यंग्यात्मक भाव में)

‘‘सुनहु सज्जन, एक कथा विचित्रा,
सींगों की हो जहँ राजनीति पवित्रा।
बुद्धि रही वन में वनवास लिए,
और मूर्ख मचे दरबार किए!’’

‘‘यह कथा नहीं है राम की, न रावण के रण की,
यह तो लीला है उन जनों की — जो सींग से हैं धन की।’’


🌟 प्रथम कांड – बाल सींगोद्भव

(मंच पर गुरु ज्ञानगिरी पाठशाला में बच्चों को सींगों का पाठ पढ़ा रहे हैं)

गुरु ज्ञानगिरी:

‘‘बुद्धि को मत देना बढ़ावा,
सींग बड़ा हो — बस यही बनावा।
गणित नहीं, अब ‘सींग-कोण’ पढ़ो,
इतिहास नहीं, मूर्खगाथा रटो।’’

(बच्चे ‘सींग वंदना’ का गीत गाते हैं):
🎶

‘‘सींग हमारे माथे के ताज,
मूर्ख बने तो मिला समाज।
जिसकी अक्ल गई घास चरने,
वही योग्य हुआ राज्य करने!’’


❤️ द्वितीय कांड – अयोध्या में प्रेमचर्या

(प्रेमचंद मूर्ख़ा और रूबी सींगवाली बाग़ में)

प्रेमचंद (गाकर):
🎶

‘‘तेरे सींगों में वो बात है,
जो किताबों में कहाँ आती है!
मेरी मूर्खता पे तू लट्टू हो जा,
चल दोनों मिल के ‘नॉनसेंस’ रच लें प्रिया!’’

रूबी (लजाते हुए):

‘‘तेरे जैसे मूर्ख की ही थी मुझे तलाश,
तेरी बातें हैं, जैसे मूर्खता का प्रकाश!
IQ वालों से जी भर गया,
तू ही है असली सींगधारी यार मेरा!’’


🌳 तृतीय कांड – बुद्धिनाथ का वनवास

(बुद्धिनाथ, अकेला, वन में चल रहा है – दर्शकों से संवाद)

बुद्धिनाथ:

‘‘मैं सींगविहीन, मैं तर्कशील,
मेरा अपमान हुआ हर महफ़िल में।
क्या दोष है मुझमें, हे सृष्टि?
कि मैं मूर्ख नहीं, बस यही त्रुटि?’’

(पृष्ठभूमि में गंभीर संगीत, जंगल का ध्वनि)


📺 चतुर्थ कांड – किष्किंधा: न्यूज़ और राजनीति

(नेता घुमाव सिंह और चीखिका माइकधारी की बहस)

चीखिका:

‘‘आज देश में घोर संकट छाया,
बिना सींग वाला बौद्धिक आया!
ब्रेकिंग न्यूज़: ये सोचता है —
क्या ये राष्ट्रद्रोह नहीं कहलाता है?’’

घुमाव सिंह (माइक पर गरजते):

‘‘हमने मूर्खता को आत्मनिर्भर किया है,
बुद्धिमत्ता तो बस बातों में जिया है।
सींग से ही पहचान बनेगी,
वरना सत्ता हाथ से खिसकेगी!’’


🏥 पंचम कांड – हॉस्पिटल में हास्य

(डॉ. सींगनाथ ऑपरेशन की तैयारी में)

डॉक्टर (उपसंहार करता है):

‘‘माथे पे जगह है सींग उगाने को,
पर दिल में नहीं है सोच जगाने को।
बुद्धिनाथ, तुझे मैं समझा नहीं सका,
अब तू ही मुझे राह दिखा सका।’’


⚔️ षष्ठ कांड – युद्ध: बुद्धि बनाम मूर्खता

(राजदरबार में बुद्धिनाथ और मूर्खेश्वर का टकराव)

बुद्धिनाथ:

‘‘हे राजन, जो ज्ञान से डरता है,
वही झूठ का नगाड़ा बजाता है।
मूर्खता भी सीमित हो जब,
तभी समाज में बढ़े सब!’’

(लड़ाई नहीं, तर्कों का युद्ध होता है — दर्शक रोमांचित)


🕊️ सप्तम कांड – उत्तर ज्ञानोदयन

(राजा पश्चाताप करता है, सींग उतारे जाते हैं)

मूर्खेश्वर (गंभीर भाव में):

‘‘जो माथे पर सींग थे, अब हट गए,
जो मन में अंधकार था, अब कट गए।
ज्ञान को फिर राजसिंहासन दो,
सोचो, समझो — और राष्ट्र को मोड़ दो।’’

(सब पात्र एकत्र हो, अंतिम गीत गाते हैं):

🎶

‘‘अब न कोई सींग दिखाए,
मन में सोच की बात आए।
मूर्खता को हँसी में बाँटो,
पर ज्ञान को मत तानो-छाँटो।’’


🎭 समापन – सूत्रधार

सूत्रधार:

‘‘लीला थी यह, एक अद्भुत व्यंग्य की,
मूर्खता के उजाले में बुद्धि की तंग सी।
हँसो, गाओ — पर सोचो ज़रूर,
सींग न हो — तो बेहतर दस्तूर।’’


🔔 समाप्त।


अगर आप चाहें तो मैं:

  • इस स्क्रिप्ट की PDF बनाकर
  • गीतों की तालबद्ध लिरिक्स
  • परदे व संगीत निर्देशन
  • और रोल डिस्ट्रीब्यूशन गाइड भी तैयार कर सकता हूँ।

कहिए — प्रस्तुत करें पूरी स्क्रिप्टबुक मंच के लिए? 📘🎭

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...