जिनके सीने में धधकती है देशप्रेम की आग,
उन्हें हरगिज़ नहीं भूलेगा जालियांवाला बाग।
हमारे दमन के लिए गोरे रौलट एक्ट लाए थे,
पहले विश्व युद्ध से चूंकि वो कसमसाए थे।
सूत्रों में बंधी इंसानियत को ये साम्राज्यवादी चूसना चाहते थे,
हमारी चिंगारी बुझाकर हमें मजबूरी में झुकाना चाहते थे।
पर उन्हें क्या पता था—भारत की रगों में पानी नहीं, लावा बहता है,
जेलें बना लो जितनी चाहे—ये देश हर जंजीर से बड़ा है, रहता है।
अमृतसर की धरा पर जब किचलू ने हुंकार भरी,
सतपाल ने सत्य के दीप जलाए, भीड़ उमड़ पड़ी।
धर्म-नवमी के जुलूस में जब दोनों ने एक ही प्याले से जल पिया,
अंग्रेज़ों ने देखा—उनका “फूट डालो” मंत्र वहीं मर गया, वहीं गिर गया।
उन दो नेताओं के पीछे पूरी पंजाब-धरती चलती थी,
उनकी आवाज में वो आग थी जो ज़ुल्म के महलों को गलती थी।
इसीलिए कायर हुकूमत ने रात के चोर की तरह दोनों को उठाया,
धर्मशाला की बंद गाड़ी में ले जाकर उन्हें कैद पिंजरे में ठूंसा-पछताया।
लोगों ने जब सुना—“किचलू-सतपाल बंद हैं”—
पंजाब का खून खौल उठा, दिल में बगावत बंद है।
जनता फूटी नदी की तरह उमड़ी जालियांवाला बाग में,
निहत्थी थी, पर इरादा फौलादी था हर धड़कन में, हर राग में।
और उधर आता है डायर—सैनिकों की कतार लेकर,
एक कायर, जो बच्चों तक से डरता था हथियार लेकर।
जितनी गोलियाँ थीं, उतनी ही जिंदगियाँ रौंद दीं,
दीवारों ने ज़ख्म समेटे, धरती ने चीखें पोंछ लीं।
अरे डायर! तूने समझा था खून बहाकर हम डर जाएँगे,
तू भूल गया—हम वो हैं जो लहू में भी आज़ादी के इरादे उगाएँगे।
तेरी गोलियाँ शरीर भेद सकीं, मगर इच्छाशक्ति नहीं;
तेरी बंदूकें भीड़ मार सकीं, पर आंदोलन की गहराई नहीं।
किचलू-सतपाल की गिरफ्तारी क्यों हुई?
क्योंकि अंग्रेज़ों को डर था उन दो नामों से—
डर था उनकी एकता से, उनकी लोकप्रियता से,
डर था कि ये दोनों मिलकर भारत को जगा देंगे,
और साम्राज्य का ताज हिंदुस्तान की आँधी में उड़ जाएगा।
डर सच भी हुआ—
जालियांवाला बाग के खून ने जलती मशाल बनकर,
भगत सिंह को अंगार बनाया,
राजगुरु-सुखदेव को रणभूमि का नारा बनाया,
उधम सिंह ने लंदन में जाकर वह हिसाब भी चुकता कर आया,
जिसने साम्राज्यवाद की रूह तक दहला डाला, कंपा डाला।
तारीखें बदलती रहीं, पर बाग की दीवारें आज भी बोलती हैं—
“हम गवाह हैं उस दिन की, जब इंसानियत रो पड़ी थी।
हम गवाह हैं उस रात के, जब आज़ादी जाग पड़ी थी।”
किचलू की कलम, सतपाल की सेवा, और जनता की जंग—
तीनों मिलकर बने वो तूफ़ान, जिसने साम्राज्य को कर दिया दफ़्न।
गुलामी की ईंटों से बनी थी वो सरकार,
पर हमने उसे खंडहर में बदला—अपने शहीदों के उधार उतार-उतार।
हम वो लोग हैं जिनके इरादों को मिट्टी भी सलाम करती है,
जिनके खून में rebellion है, जिनकी सांस में आज़ादी धरती है।
जालियांवाला बाग सिर्फ़ एक स्थान नहीं—एक चेतावनी है,
कि भारतवासी कभी किसी साम्राज्य की गुलामी स्वीकार नहीं करने देंगे—
चाहे कीमत अपनी जान ही क्यों न हो।
No comments:
Post a Comment