पता नहीं लोग इकदम बदल कैसे जाते हैं,
उन्हें ही छोड़ देते जिन्हें अपना बताते हैं।
कल तक क़समों में सच की दुहाई देते थे,
आज उनके ताने तीर बनकर चुभे जाते हैं।
चेहरे पे मासूमियत, दिल में इरादा ए कत्ल
वो रिश्तों को भी मोहरों की तरह चलाते हैं।
बुरे दौर में हमने जिनकी हर सू देखरेख की
वो ही यार इन दिनों अपने फायदे गिनाते हैं।
हम समझते थे वफ़ा कोई चीज़ होती है,
पर यहाँ तो लोग मौक़े देखकर ही मुस्कुराते हैं।
दिल तोड़ने का हुनर भी क्या खूब आया है उन्हें,
जैसे किसी बात पर कोई पछतावा ही नहीं जताते हैं।
हमने सच में जो था, वही दिल से दिया,
और उन्होंने झूठ में भी अपनी जीत के झंडे गाड़ आते हैं।
अब सीख लिया हमने भी हर मुस्कान पर यक़ीन न करना,
क्योंकि लोग ज़रा-सा मौसम बदलते ही रंग दिखाते हैं।
हम तो आज भी उसी मोड़ पर खड़े साफ़-दिल हैं,
पर लोग चलने से पहले भी सौ बहाने बनाते हैं।
और हां…
अब किसी के जाने का ग़म नहीं होता हमें,
क्योंकि जो छोड़कर चला जाए—
वो कभी ‘अपना’ था ही नहीं, बस हम ही भूल जाते हैं।
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