Monday, 1 December 2025

डैडी जी

यह रही 

अपनों का खो जाना,
हमसे ज़ुदा हो जाना,
मन की उजली दीवारों पर
अँधेरों को सजा देता है।

समय के सूने दालानों में
कदमों की आहट खो जाती है,
जिस्म तो चलता है आगे,
पर रूह कहीं पीछे रह जाती है।

वैराग्य की परछाइयाँ
धीरे-धीरे मन को ढँक लेती हैं,
जो कल फूलों-सी कोमल थीं
आज पत्थर-सी सख़्त लगने लगती हैं।

रास्ते भी अजनबी लगते हैं,
मंज़िलें भी धुंध में ढल जाती हैं,
अपनों के बिछड़ने का दुख
हर मोड़ पर सांसें चुभलाती हैं।

मेरे डैडी भी क्या थे,
कुदरत की दुआ थे,
उनकी आँखों में जैसे
मेरे कल की तराशी हुई राहें थीं।

उनके शब्दों में सुकून था,
उनके होने में भरोसा था,
मानो दुनिया के हर तुफ़ान से
लिपटकर बचा लेने का वादा था।

जब मैं लड़खड़ाता था,
वो मुस्कुराकर थाम लेते थे,
मेरी हर ठिठकी उम्मीद को
अपने हौंसलों से नाम देते थे।

लेकिन जब सहारा ही छूट गया,
तो जैसे धरती भी डगमगा गई,
आसमान का वो तारा टूटकर
सीधे दिल में उतरता चला गया।

जीवन की ठहरी हुई नदी में
नए किनारे नहीं मिलते,
बीते पलों की परछाइयाँ
आंखों में गहरा धुंधलका भर देतीं।

दर्द जब शब्द बनकर उठे,
तो वैराग्य का दीप जलता है,
और मन—एक खोया यात्री—
राहों से भी अपना नाता तोड़ देता है।

पर डैडी की यादें अब भी
धड़कनों में बारिश-सी बरसती हैं,
उनकी आवाज़ की गूंज
अब भी खामोशियों को तरसती है।

वो कहीं दूर नहीं गए,
बस एक परदा-सा पड़ा है बीच,
हमारी सांसें यहाँ चलती हैं,
उनकी दुआएँ वहाँ से पहुँचती हैं।

हर कठिन रात में,
उनकी परछाईं कंधे पर हाथ बन जाती है,
हर कसक में उनका नाम
एक मरहम की तरह लग जाता है

जो लोग दुआ बनकर जीवन में उतरते हैं,
वो मौत से भी कभी नहीं जाते,
उनके जाने भर से
उनकी मौजूदगी नहीं मिट जाती।

वो हवा की तरह होते हैं,
दिखते नहीं—पर जीने को बना देते हैं,
वो यादों की तरह होते हैं,
कभी दर्द…कभी सहारा बन जाते हैं।

मेरे डैडी भी क्या थे—
सच में कुदरत की दुआ थे,
आज भी हर धड़कन में
वही दुआ बनकर जीते हैं।



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