✨ स्वर्ण मंदिर – इतिहास की काव्य कथा ✨
अमृत तल की पावन धरती, नानक ने बीज बोए थे,
शांति, प्रेम, बराबरी के सपने जग में जो रोए थे।
आवाज़ लगी इक ईश गुणों की, संगत-कीर्तन जागा था,
अमृतसर की मिट्टी में तब, हरमन प्यारा भागा था।
रामदास गुरु ने फिर आकर, सरोवर की रेखा खींची,
खुशियों की इक ज्योति जली थी, दिल की हर उलझन सींची।
खुदाई में संगत उतरी, सेवा का सागर उमड़ा,
मानवता का फूल खिला था, दीन-दुखी सब संग जुड़ा।
अर्जुन देव ने मंदिर की नींव, मियां मीर से रखवाई,
चार दिशा के द्वार बनाकर, दुनिया को राह दिखलाई।
नीचे रखकर चरण पथारा, ऊँचे अहं को तोड़ा था,
हर वर्ग, हर जाति के दिल ने, गुरु का आंगन छोड़ा था।
आदि ग्रंथ का प्रथम प्रकाश, हरमंदिर में दीप जला,
भाई गुरदास जी ने पढ़कर, ज्ञान का अमृत फिर बहा।
कीर्तन की मधुर धुनों में, मन का अंधियारा खोया,
सरोवर में झिलमिल करता, रब का स्वरूप ही सोया।
फिर आईं आँधियाँ अफगानों की, अब्दाली का कहर चला,
कई बार मंदिर टूटा, पर हर बार फिर से जड़ से उगा।
सिख जवानों के साहस पर, इतिहास भी पर्वत झुका,
चूर हुए पत्थर लाख मगर, विश्वास कभी ना रुका।
आया रणजीत सिंह का दौर, सोने की वर्षा होने लगी,
दुनिया ने तब पहली दफ़ा, “स्वर्ण मंदिर” की रौनक जगी।
गुम्बद चमके सूर्य समान, परिक्रमा का मन हरसा,
सेवा-भाव, भक्ति-धारा ने, हर दिल में चिर दीप रखा।
बीते वर्षों ने देखा दुख, घाव लगे इतिहास में,
फिर भी मंदिर खड़ा रहा, इकता के विश्वास में।
सरोवर अब भी अमृत सा, घुलता मन की वेदना,
दुनिया भर से लोग आते, पाने को शांति-रेणा।
आज भी लंगर की थाली में, दुनिया का रूहानी राग,
हाथ जोड़कर बैठा मानव, मिट जाता हर भेद-फास।
चार दरवाजों से बहती है, मानवता की एक हवा,
स्वर्ण मंदिर की पावन जै, जग में देता प्रेम-दवा।
✨ निष्कर्ष ✨
स्वर्ण मंदिर की कथा नहीं,
एक प्रार्थना है अनंत सी;
सोने-चांदी में क्या रखा —
सबसे सुंदर उसकी मानवता है,
जो हर दिल में बसती है।
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