सलीके से वो इक भी काम नहीं करता।
बोलता है बहुत मगर निभाता नहीं कुछ,
बेमतलब वो कभी भी सलाम नहीं करता।
लफ़्ज़ जब बोझ बनें, सच अपना वज़्न खो दे,
वो बयानात में भी कोई काम नहीं करता।
जिसे आईने से भी ख़ौफ़ हो अपने ही अक्स का,
वो दूसरों के गुनाह का इल्ज़ाम नहीं करता।
जहाँ अक़्ल से पहले मुनाफ़ा सलामत हो,
वहाँ दिल किसी रिश्ते को अंजाम नहीं करता।
मैंने सीख लिया है ख़ामोशी का फ़लसफ़ा भी,
हर बात का चर्चा अब सरेआम नहीं करता।
मेरे पास पुरानी यादों की बहुत-सी रद्दी है,
चंद सिक्कों के लिए मगर नीलाम नहीं करता।
“मैहता” ने समझा है इस शहर का दस्तूर,
जो ख़ुद को बचा ले वही बदनाम नहीं करता।
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