✨ स्वर्ण मंदिर – एक महाकाव्य ✨
प्रथम सर्ग – नानक का उदय
जब धरती पर फैला तम भारी, झूठ-अभिमान का जंगली जाल,
मानव मानव से दूर हुआ, मन का हुआ पत्थर-सा हाल।
तब रैण सबेरा लेकर आया, कार्तिक की पावन भोर,
रवि-सी प्रकट हुई एक ज्योति, नानक नाम अमर विभोर।
उन्होंने शांति की वंशी बाँधी, करुणा का संदेश सुनाया,
“इक ओंकार” का सत्य महामंत्र, जग में अमृत-धार बहाया।
उनके कदम जहाँ पड़े, वहाँ प्रेम के अंकुर फूटा,
अमृतसर की मिट्टी ने भी, श्रद्धा का दीपक छूटा।
द्वितीय सर्ग – रामदास द्वारा अमृतसर का उद्भव
चतुर्थ गुरु रामदास पधारे, सौम्य प्रभा के धाम,
देखी धरती एक अनोखी, शांत, परंतु अनाम।
उन्होंने सरोवर की कल्पना, प्रेम तरंगों से सींची,
संगत उतरी सेवा करने, मिट्टी पावन हो गई नींवी।
कुदरत ने भी आसमान से, बरखा-सी आशीष बरसाई,
सरोवर की तरंगों ने, मानवता में नयी ज्योति जगाई।
अमृत का सर बना पावन, जिसकी लहरें सत्य घोले,
जिसके जल में डूब नहाए, मन के सब संशय टटे खोले।
तृतीय सर्ग – हरमंदिर की नींव
समय बीता पाँचवें गुरु का, अर्जुन देव दयाल,
जिनके मुख से झरती वाणी, जैसे गंगा-सी निर्मल धार।
उन्होंने रचा एक मंदिर, सब जाति-धर्म से परे,
जहाँ विनम्रता हो सीढ़ी, प्रेम हो मंदिर के द्वार खुले।
दिन पावन था, शुभ घड़ी आई, नींव रखी जो मियां मीर ने,
हिंदू-मुस्लिम एकत्व का दीप, इतिहास में गहरे घीरे।
चार दिशा के द्वार बनाए, निष्काम-सेवा का वास,
जहाँ आए जो कोई थका हुआ, पाए मन का विश्वास।
चतुर्थ सर्ग – आदिग्रंथ का प्रकाश
साल सोलह सौ चार का, दिवस हुआ अद्भुत पावन,
हरमंदिर में पहली बार, रखा गया ग्रंथ महान।
भीतर गूँजी अमृत ध्वनि, कीर्तन-रस की मधुर पुकार,
भाई गुरदास प्रथम ग्रंथी, बने ज्ञान के अंबर तार।
गुरबाणी की शीतल छाया, मन के ताप को हरती गई,
भक्तों की आँखों में ज्योति, करुणा से फिर भरती गई।
सरोवर में झिलमिल प्रतिबिंब, जैसे सागर में चाँद नहा,
धरती स्वर्ग समान हुई, जब वाणी ने रूप अलौकिक गढ़ा।
पंचम सर्ग – संघर्ष, समर और पुनर्निर्माण
पर समय ने घनघोर अंधेरा भी, इस मंदिर की राह में फैका,
अब्दाली के क्रूर प्रहारों ने, मंदिर को कई बार तोड़ा, ढेका।
किन्तु सिखों की हिम्मत पर्वत, उनका मन वज्र समान,
जितनी बार गिरा धाम यह, उतनी बार उठा दुगुना महान।
रक्त-रंजित वे रातें भी थीं, जब पंजा सिंह, बंदा वीर,
मंदिर के द्वारों पर पहरे थे, कौम संभाले, धीर-गंभीर।
विनाश की राख में भी, आशा की ज्वाला सोई थी,
गुरु की कृपा से हर बार, हरमंदिर में नयी प्राण फूँकी थी।
षष्ठ सर्ग – रणजीत सिंह का स्वर्ण आवरण
उन्नीसवीं सदी का उजियारा, रणजीत सिंह का यश-प्रसार,
उदार सिंह-सम्राट ने देखा, हरमंदिर का तेज अपार।
तब लिया प्रण एक महान —
“सोने से मंडप सजाऊँगा।”
नीला अम्बर छूते गुम्बद पर,
सुनहरी दुनिया बसाऊँगा।
कई वर्ष का प्रयास अनूठा, सोने की परतें चमकीं,
मंदिर को मिला वह वैभव, जिसकी कथाएँ दिशाओं में थमीं।
सूर्य किरण जब गिरती छत पर, मानो अमृत चमक उठे,
गंगा-जैसी शांति बरसती, श्रद्धा के रसे-रसक उठे।
सप्तम सर्ग – आधुनिक युग और अमर मानवता
समय की धारा चलती जाती, सुख-दुख आते-जाते हैं,
कभी घाव इतिहास के गहरे, मंदिर पर भी लग जाते हैं।
परंतु हर बार सेवा-भाव, हर बार संगत की शान,
फिर सुंदर रूप में जगमगाया, हरमंदिर का स्वर्ण स्थान।
आज भी सरोवर की धारा, मृदुल शांति का गीत सुनाती,
लंगर की थाली मानवता को, प्रेम-मिश्री से भर भर जाती।
चार दरवाज़े कहते प्रतिदिन —
“आओ, तुम सब मेरे हो,”
धर्म, जाति, वर्ग से ऊपर,
मानवता के सागर में खो।
उपसंहार – अमृत ज्योति
स्वर्ण मंदिर केवल धातु नहीं,
न कोई शस्त्र, न कोई रूप,
यह तो मानवता की ज्योति है,
जिसका न क्षय, न कोई स्वरूप।
जहाँ नाम-सिमरन की धुनें,
अमर आकाश को छू जातीं,
जहाँ सरोवर के जल में
आत्माएँ निर्मल हो आतीं।
यही है हरमंदिर का महाकाव्य —
सोने का नहीं,
मानवता का अमृत-दीप,
जो सदियों तक जग में जलता रहेगा।
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