दरख़्तों के तनों पर छाल अब अच्छी नहीं लगती,
उसकी नागिन जैसी चाल अब अच्छी नहीं लगती।
वो वक़्त गुज़र गया जब मैं झट ही माँग लेता था,
मुआफ़ी की डरपोक ढाल अब अच्छी नहीं लगती।
केएफ़सी , पीज़ा के इस होम डिलीवरी के दौर में
घर की पकाई कोई दाल अब अच्छी नहीं लगती।
बाज़ार का सारा काम जब से सिमट गया मॉलों में,
एतबार की मस्त हड़ताल अब अच्छी नहीं लगती।
दे दो एक लेटेस्ट मोबाइल स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी को,
उसके हाथों में उफ़ मशाल अब अच्छी नहीं लगती।
पहले इस हाल में देख कर बहुत सुकून मिलता था,
वो ऐसी बेबस ओ बदहाल अब अच्छी नहीं लगती।
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