Monday, 27 October 2025

झरते ही नहीं


अदब से बात करें तो वो समझते ही नहीं,
अब मेरे लबों से फूल कभी झरते ही नहीं।

उमड़े थे जो बादल आँखों में चाँदनी बनकर,
वो अब हक़ीक़त में लौटकर बरसते ही नहीं।

थकान ओढ़े हुए लम्हे गुज़रते हैं चुपचाप,
दिल की गलियों में अब साज़ बजते ही नहीं।

कभी तो लोग थे जो हाल-ए-दिल समझ लेते,
अब आईने भी हमसे बात करते ही नहीं।

तूने सीखा है जुदाई का हुनर इस क़दर,
कि अब मिलन के भी मौसम सजते ही नहीं।

ज़रा सी बात पे दिल टूट जाता है ‘मनोज’,
वो पहले जैसे रिश्ते अब बनते ही नहीं।



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