हर साल उसे जलाते हो
और कितना इतराते हो
पर स्वयं जानकियों पर
गिद्ध दृष्टि तुम जमाते हो
कहते हो रावण मरा है,
पर ज़िंदा हमारे भीतर है
तुम्हारी आँखों में हवस है,
तुम्हारे मन के भीतर नर है
तुम दुर्गा की मूर्तियाँ ढोते हो,
पर बेटियाँ जिंदा जलती हैं
शब्दों में 'देवी' बोलते हो,
और नजरें तन पर गढ़ती हैं
क्या जलाए रावण को, जब
घर-घर में दशानन पलते हों?
क्या दीया जलाओगे, जब
मन मंदिरों में साँप थिरकते हों?
तुम राम की मर्यादा क्या जानो,
तुम्हारा धर्म भी व्यभिचारी है
तुमको सीता नहीं, बस देह दिखे,
और रावण से होड़ तुम्हारी है
चौराहों पे भाषण झाड़ोगे,
स्त्री-सम्मान के ढोंग करोगे
और भीतर मोबाइल में छिपकर,
किसी की तस्वीर ज़ूम करोगे
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