चलो अच्छा हुआ, वे छोड़ गये बीच राह में,
और ठंडक भी नहीं रही अब मेरी आह में।
अब पूछते हैं बार-बार, नाम क्यों लेते हो,
जो कभी आ बैठे थे उफ़, ख़ुद पनाह में।
इश्क़ कम्बख्त शै ही यारों बहुत ख़राब है,
फ़र्क़ नहीं रखती ये ग़ुलाम और शाह में।
उनका जाना कुछ इस तरह रास आ गया,
गोया कि मिलती हो दवा बिलखती चाह में।
हमने सीखा है तन्हाई से बात करना अब,
कुछ भी बाक़ी नहीं रहा इस निगाह में।
वो कहते थे “हमसफ़र हैं उम्र भर के लिए”,
अब नज़र आते हैं बस दूसरों की राह में।
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