मलाल सहर को कि न मिल सकी कभी आफ़ताब से ,
तो महरूम रही उधर सुबह भी, दीदार -ए-महताब से |
इन दिनों मिलावट में भी मिलावट लीजिये लगी होनें ,
हुये हबक-ओ-ख़ुमार दोनों ही गुम बोतल-ए-शराब से |
मुकाबला हमारा क्या ख़ाक करता, वो सामने आकर ,
नाम ऊँचा किया भी तो, महज़ जुगाड़-ए-इंतिख़ाब से |
खर्चा तालीम-ए-अत्फ़ाल यूँ इताब-ए- अज़ाब देता है ,
आजिज़ सा हो जाता हूँ मैं फकत नाम-ए-इंकलाब से |
अब तलक भी बदन में फफोलों के फटनें के हैं निशाँ ,
हाय क्या तीखी लपटें उठी थीं उस शोला-ए-शवाब से |
..मनोज मैहता
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