कुछ लोग ऊँचे होने के वहम में जिये जा रहे हैं
अपने अहम से औरों को परेशाँ किये जा रहे हैं
लद तो गये है दिन पर अकड़ नहीं लदी उनकी
इसी ऐंठन के जामों को भर भर पिये जा रहे हैं
ख़ुद्दारी जिसके किरदार का हिस्सा है पैदायशी
उसी की हस्ती पर यारो तोहमतें दिये जा रहे हैं
माना कि मेहमान-ए-ख़सूसी हैं वो बड़े लोगों के
हम कहाँ उनका अज़ीम तोहफ़ा लिये जा रहे हैं
उतरे हुए ये शाही लिबास उन्हीं को हों मुबारक
हम तो शान से पतलून पे पैबंद सिये जा रहे हैं
ऐसे दीवाना बन कर एकटक न देख तू 'मनोज'
फड़ फड़ाने की मानीं कि बुझने दिये जा रहे हैं
.मनोज मैहता
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