Tuesday, 23 August 2016

शक की गिरफ़्त में आ गई!!

इक ऐसी गहरी बेबसी मेरी शख्सियत में आ गई
मेरी कलम भी उनके शक की गिरफ्त में आ गई

बातें करते हैं बहकी और आँख तक मिलाते नहीं
वो ऊँचे उठ गये या कमी मेरी हैसियत में आ गई

दिल में उमड़े ख़्याल-ए-अब्र बेताव थे बरसने को
तेज़ आतिश-ए-नफ़स तेरी पर हरकत में आ गई

मायूस रहना यूँ तो मिरे किरदार का हिस्सा न था
यूँ रहनें की आदत मगर अब रियाज़त में आ गई

तेरा कहने का सलीका शायद उसे भाया 'मनोज'
इक मीठी सी शोखी उसकी शिकायत में आ गई
                                             .. मनोज मैहता

No comments:

Post a Comment

भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...