इक ऐसी गहरी बेबसी मेरी शख्सियत में आ गई
मेरी कलम भी उनके शक की गिरफ्त में आ गई
बातें करते हैं बहकी और आँख तक मिलाते नहीं
वो ऊँचे उठ गये या कमी मेरी हैसियत में आ गई
दिल में उमड़े ख़्याल-ए-अब्र बेताव थे बरसने को
तेज़ आतिश-ए-नफ़स तेरी पर हरकत में आ गई
मायूस रहना यूँ तो मिरे किरदार का हिस्सा न था
यूँ रहनें की आदत मगर अब रियाज़त में आ गई
तेरा कहने का सलीका शायद उसे भाया 'मनोज'
इक मीठी सी शोखी उसकी शिकायत में आ गई
.. मनोज मैहता
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